अजी कर शादी उनसे, बुलावा बर्बादी का,
खुदी दे डाला मैंने, खुद ही को कोसता हूँ॥
न ये पाबन्दियाँ थीं, कुँवारा जिन दिनों था,
कई दिलकश हसीनों का, सहारा उन दिनों था,
मजे का दौर था वो, खुद ही को कोसता हूँ॥
नाम कालेज का लेकर, सिनेमा हाल में होता,
जहाँ अब डर लगा करता, वहाँ हर-हाल में होता,
गई वो बहादुरी खो, खुद ही को कोसता हूँ॥
न ही दफ्तर का झंझट था, न चिंता बॉस की कोई,
सिवा बस एक रिश्ते के, न रिश्ता खास था कोई,
वो रिश्ता खो गया अब, खुद ही को कोसता हूँ॥
न बीबी की लिपिस्टिक थी, न झुमके थे, न बाले थे,
किसी का चाँद सा मुख था, नज़र के मस्त प्याले थे,
अब तो हर ओर हैं आँसू, खुद ही को कोसता हूँ॥
वो दुनियाँ कितनी अच्छी थी, न चौका था, न चूल्हा था,
कई कमसिन हसीनों के, दिलों का मैं तो दूल्हा था,
कहाँ ये आ गए हम, खुद ही को कोसता हूँ॥
न साले खटमलों से थे, न जोंकें सालियों सी थीं,
न ही बीबी की झिड़कन थी, न बातें गलियों सी थीं,
कहाँ ये फँस गए हम, खुद ही को कोसता हूँ॥
न बच्चे थे, न बच्चों की, हुआ करती थी ये फ़ीसें,
लाख कोशिश भी करने पर, निकल आती हैं, ये खींसें,
बजट बनता बनाए न, खुद ही को कोसता हूँ॥
रणवीर सिंह (अनुपम), मैनपुरी (उप्र)
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