Saturday, May 16, 2015

64 ज़िंदगी क्या ज़िंदगी

ज़िंदगी क्या ज़िंदगी? जिसमें नहीं संघर्ष है,
गम के बिन जाना है किसने, क्या खुशी, क्या हर्ष है॥
 
ताव को लाने में कितने, हाथ घायल हो गये,
तब कहीं महलों में उनके, खूबसूरत फर्श है॥
 
बारगाहों के उदर में, हो रहे कितने कुकर्म,
हर कदम पर गंदगी है, हर कदम पर नर्क है॥
 
कल्पना कितनी सुखद है, बिजलियों की चमक की,
जब न टूटी आशियां पर, क्या पता, क्या बर्क है॥
 
ऐसे नेता ही यहाँ पर, देश का दुर्भाग्य हैं,
लब्ज-औ-करतूत में, कोसों का जिनके फर्क है॥
 
देश को आयोग, जाँचों, से मिला अब तक क्या,
आज तक निकला है इनसे, कौन सा निष्कर्ष है॥
 
सौ के बदले एक बोलो, बोलिए पर सोचकर,
लाखों पर भारी पड़ेगी, बात जिसमें तर्क है॥

रणवीर सिंह (अनुपम), मैनपुरी (उप्र)
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