Saturday, May 16, 2015

77 याद हैं पगडंडियाँ (गीत)

पगडंडियां
गीतिका छंद (14/12)
2122 2122,  2122  212
याद हैं पगडंडियां वे, काँटा चुभा जातीं थी' जो,
और खेतों से गुजरकर, गाँव तक जातीं थी' जो॥

धूप में कुम्लाहे चेहरे, और सूखे खेत वो,
लूह के लगते थपेड़े, और तपती रेत वो,
बादलों की छाँव खातिर, ताकना वो गगन को,
नहिं भुलाये भूल पाता, बरसती उस अग्नि को,
नंगे तलवों में जला, छाले बना जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

चिलचिलाती धूप वो, वो दुपहरी जेठ की,
नौकरों की दृष्टि नीची, अरु घुड़क वो सेठ की,
वो मजूरों का पसीना, हेंकड़ी वो मेट की,
सूर्य की अगनी से प्रबल, अग्नि भूखे पेट की,
मार कंगाली की थी, बुझदिल बना जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

नाव कागज़ की चलाना, केंचुओं का रेंगना,
देहरी तक पानी का भरना, तस्तरी से फेंकना,
टपकते छप्पर पे चढ़के, सांस का वो मूंदना,
याद है अब भी मुझे वो, छप्परों से कूदना,
सेंकना उन एड़ियों का, मोंच खा जातीं थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

पोखरों में वकदलों का, मौन होके ताकना,
पर भिगोए पक्षियों का, पेड़ से वो झाँकना,
कूकरों का वो घेर लेना, खरहाओं के ठौर को,
देखते थे फिर वही, जीवन-मरण की दौड़ को,
ज़िंदगी और मौत में, संघर्ष दिखलाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

नीम के पेड़ों के नीचे, वो निबौरी बीनना,
तो कहीं टूटी पतंगें, लूटना और छीनना,
पटि्‌टयों का वो लड़ाना, वो बुदक्के फोड़ना,
शाम को दीपक के आगे, भिन्न का वो जोड़ना,
अब भी चिड़ है उस हवा से, लौ बुझा जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

वो जुते खेतों में जाकर, आलुओं का बीनना,
टोंटकर खेतों से सरसों, और उसका मींजना,
बेचकर पैसों को गिनना, और खुश हो झूमना,
और गिन-गिन खर्च करना, और मेला घूमना,
थी क्षणिक पर, क्या खुशी थी, गम भुला जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

पूस की ठंडी हवाओं, की चुभन वो शूल सी,
वो बखारी का बिछौना, वो रजाई झूल की,
पैबंदों की वो कमीजें, वो सहारा आग का,
वो शिकस्तें मेहनतों की, जीतना दुर्भाग्य का,
आस में प्रभात के, हर रात कट जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

अधफटी धोती में नानी का, शिथिल तन काँपना,
कोनें की उस पुआल में, रह-रह के उसका खाँसना,
फूलना फिर साँस का, नाम हरि का जापना,
पोर के संग आँख लगना, पोर के संग जागना,
कैसी निष्ठुर ठंड थी, रूह कँपा जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

बच्चे का आँचल छुपके, सूखे स्तन चूसना,
रोते-रोते लोट जाना, और माँ से रूठना,
लौटकर फिर नीम नीचे, माँ के मुख को ताकना,
शून्यमय उस ज़िंदगी का, शून्य में वो झाँकना,
और वो गंभीर चितवन, मौन बरसाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

वो मके की एक रोटी, वो कटोरा साग का,
देखते ही वो भड़कना, पेट की उस आग का,
अधबुझी उस भूख को ले, फिर मदरसा भागना,
चाट खाते साथियों को, दूर से वो ताकना,
लार थी या थी गरीबी, मुँह भिगा जाती थी जो॥
याद हैं पगडंडियां...

मास्टर का साँट से, नंगा मेरा तन पीटना,
और कलमों को पकड़कर, जोर से वो खींचना,
गाल पर खाके तमाचा, मेरा आँखें मींचना,
दर्द से मेरा कराहना, और फिर वो चीखना,
मार वो हर बार की, मजबूत कर जाती थी जो॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
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गीत

याद हैं  पगडंडियाँ, काँटे  चुभा  जातीं  थी' जो।
और खेतों' से गुजरकर गाँव तक आती थी' जो॥

धूप में कुम्लाहे चेहरे, और सूखे खेत वो,
लूह के लगते थपेड़े, और तपती रेत वो,
बादलों की छाँव खातिर, ताकना वो गगन को,
नहिं भुलाये भूल पाता, बरसती उस अग्नि को,
नंगे' तलवों में कई, छाले बना जाती थी' जो॥
याद पगडंडी ...

पूस की ठंडी हवाओं, की चुभन वो शूल सी,
वो बखारी का बिछौना, वो रजाई झूल की,
पैबदों की वो कमीजें, वो सहारा आग का,
मेहनतों की वो शिकस्तें, जीतना दुर्भाग का,
आस में प्रभात के, हर रात कट जाती थी' जो॥
याद पगडंडी ...

वो मके की एक रोटी, वो कटोरा साग का,
देखते ही वो भड़कना, पेट की उस आग का,
अधबुझी उस भूख को ले, फिर मदरसा भागना,
चाट खाते साथियों को, दूर से वो ताकना,
लार थी या थी गरीबी, मुँह भिगा जाती थी' जो॥
याद पगडंडी ...

मास्टर का साँट से, नंगा मेरा तन पीटना,
और कलमों को पकड़कर, जोर से वो खींचना,
गाल पर खाकर तमाचा, मेरा आँखें मींचना,
दर्द से मेरा कराहना, और फिर वो चीखना,
मार वो हर बार की, मजबूत कर जाती थी' जो॥
याद पगडंडी ...

रणवीर सिंह (अनुपम)
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