76. दुनिया क्यों शोर मचाती है (नवगीत)
दुनिया क्यों शोर मचाती है?
मेरे वेश्यालय जाने पर।
काहे उत्पात उठाती है,
मेरे वेश्यालय जाने पर।
सामाजिक कुटिल व्यवस्था को,
मैं भी जानूं, तू भी जाने,
फिर इतना ढोंग दिखावा क्यों?
काहे यूँ बनते अनजाने।
अपनी इस वर्णअंधता को,
क्यों दूर नहीं हो कर पाते,
जग नहीं घूमता, खुद घूमो,
इस सच को काहे, झुठलाते।
ज्ञानी ध्यानी होकर के भी,
क्यों मन है नहीं ठिकाने पर।।
महलों के भीतर ये कुकर्म,
ये भरा उदर ये ठाट-वाट,
नित नए जिस्म को चूस रहे,
ये नैतिकता, ये राजपाट।
जाने पर जान निकलती क्यों,
आ जाने पर क्यों परेशान,
क्यों इतनी होती उठा-पटक,
क्यों मचता इतना घमासान।
क्यों इतना हाहाकार मचे,
क्यों रहता रोज निशाने पर।।
इतना क्यों शोर-शराबा है,
इस वेश्यालय के मुद्दे पर,
क्योंकर हड़तालें, प्रदर्शन,
इस वेश्यालय के मुद्दे पर।
यह भरा पेट क्या जानेगा,
क्या चीज भूख, क्या जठरानल,
उपवास बहुत आसान मगर,
फाँके करना, होता मुश्किल।
असली मुद्दे को छोड़छाड़,
आ जाते गाल बजाने पर।।
पुरुषों की कामपिपासा ही,
नारी को यहाँ पर लाती है,
तुम उसे बदचलन कहते हो,
जो तुम्हरी भूख मिटाती है।
जिसका परिणाम लोकहित हो,
उससे नहीं श्रेष्ठ कर्म जग में,
मानव, मानवता जो जी ले,
इससे नहीं श्रेष्ठ धर्म जग में।
पर मुख पर बीस मुखौटे हैं,
आती है लाज बताने पर।।
हो चुका ज्ञान अब डर कैसा,
मुझको कामी कहलाने में,
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको,
वेश्यागामी कहलाने में,
क्या? कौन यहाँ पर कहता है?
इस बात की क्यों मैं फिक्र करूँ,
जो सच सुनने से डरते हैं,
उन डरपोकों से क्या डरूँ।
मुझको कुछ भी अफसोस नहीं,
अंतर की व्यथा सुनाने पर।
कोई वाट निहार रहा मेरी,
कोई आस लगाए बैठा है,
मुझ जैसे ग्राहक के दम पर,
कोई हाट सजाए बैठा है।
कोठे की पीड़ा-आर्तनाद,
किसने जानी चलते-चलते,
किसको मालूम बिके जब तन,
तब ही भूखे बच्चे पलते।
कुछ लाभ नहीं मुँह फेरन में,
कुछ लाभ न इसे छुपाने पर।।
मेरे अंतर में झाँकेगा,
वो ही मुझको पहिचान सके,
मैं खुली हुई हूँ इक किताब,
जो पढ़ेगा वो ही जान सके।
सब खेल सोच का ही तो है,
जो सोचोगे, वो देखोगे,
गर देह देखना सीख लिया,
तो रूह कहाँ से देखोगे।
बेवशी, घुटन, तडफ़न देखी,
मैंने हर एक मुहाने पर।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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