संस्कार, आदर्श मिट गए,
अपना काम चलाने में॥
मुगल हुमायूँ-कर्णवती से,
को संबंध बनाता अब,
नर-नारी आधुनिक हो रहे,
ये न उन्हें सुहाता अब,
कैसे-कैसे काम हो रहे,
रिस्ते नए बनाने में॥
नया जोश है, नई उमंगें,
नई सभ्यता है आई,
आज सभ्य नंगों ने ली है,
नंगे होकर अँगड़ाई,
क्या-क्या नहीं मिले देखन को,
इस आधुनिक जमाने में।।
आज जवानी बनी हुई है,
पर्दों का बस आकर्षन,
आज खुली जंघाएं लेकर,
इठलाता फिरता यौवन,
गर्वित होकर देह लगी है,
इक-इक अंग दिखाने में॥
टुन्न चमेली पौआ पीकर,
मुन्नी भी बदनाम फिरे,
औ'र मुन्नी वो काम कर रही,
जो ना झंडू बाम करे,
पर्दे पर यों दिखें नारियाँ,
आती लाज बताने में॥
नंगे होकर ट्रांजिस्टर संग,
आमिर खाँ प्रचार करे,
वस्त्र त्यागकर आज सभ्यता,
लोगों को हुशियार करे,
नंगों का उपयोग हो रहा,
अब बाजार बढ़ाने में॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
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