न ऐसे रोज आकर मिल, अरे ओ नासमझ साथी।
दबाकर बात दिल में रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
दबाकर बात दिल में रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
मरा करता था तुझ पर जो, नज़र तुझसे मिलाने को,
उसी पर मर रही है तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
उसी पर मर रही है तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
न ऐसे सज-संवर करके, तूँ मेरे पास आया कर,
तुली क्यों जान लेने पर, अरे ओ नासमझ साथी।।
तुली क्यों जान लेने पर, अरे ओ नासमझ साथी।।
ये' जैसे लोग दिखते हैं, नहीं भीतर से' हैं वैसे,
समझ लोगों की फितरत को, अरे ओ नासमझ साथी।।
समझ लोगों की फितरत को, अरे ओ नासमझ साथी।।
बड़ी वहशी है' ये दुनियाँ, बदन को नोंच खाती है,
जुवन को झाँपकर के रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
जुवन को झाँपकर के रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
भरोसा कर रही उन पर, न काबिल जो भरोसे के,
कभी तो बात माना कर, अरे ओ नासमझ साथी।।
कभी तो बात माना कर, अरे ओ नासमझ साथी।।
बड़ा अभिमान है जिसके तुझे वादे, वफ़ाओं पर,
कभी वो काम न आया, अरे ओ नासमझ साथी।।
कभी वो काम न आया, अरे ओ नासमझ साथी।।
लुटाकर आबरू, इज्जत, समझ आई तो क्या आई,
समय रहते संभल जा तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
समय रहते संभल जा तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
कहाँ खुद्दार मिलते अब, कहाँ खुद्दरियां मिलतीं,
बचे दो, चार ही 'अनुपम', अरे ओ नासमझ साथी।।
बचे दो, चार ही 'अनुपम', अरे ओ नासमझ साथी।।
रणवीर सिंह (अनुपम), मैनपुरी (उप्र)
*****
No comments:
Post a Comment
Note: Only a member of this blog may post a comment.