Saturday, May 16, 2015

63 अरे ओ नासमझ साथी

न ऐसे रोज आकर मिल, अरे ओ नासमझ साथी।
दबाकर बात दिल में रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
मरा करता था तुझ पर जो, नज़र तुझसे मिलाने को,
उसी पर मर रही है तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
न ऐसे सज-संवर करके, तूँ मेरे पास आया कर,
तुली क्यों जान लेने पर, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
ये' जैसे लोग दिखते हैं, नहीं भीतर से' हैं वैसे,
समझ लोगों की फितरत को, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
बड़ी वहशी है' ये दुनियाँ, बदन को नोंच खाती है,
जुवन को झाँपकर के रख, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
भरोसा कर रही उन पर, न काबिल जो भरोसे के,
कभी तो बात माना कर, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
बड़ा अभिमान है जिसके तुझे वादे, वफ़ाओं पर,
कभी वो काम न आया, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
लुटाकर आबरू, इज्जत, समझ आई तो क्या आई,
समय रहते संभल जा तूँ, अरे ओ नासमझ साथी।।
 
कहाँ खुद्दार मिलते अब, कहाँ खुद्दरियां मिलतीं,
बचे दो, चार ही 'अनुपम', अरे ओ नासमझ साथी।।

रणवीर सिंह (अनुपम), मैनपुरी (उप्र)
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