Saturday, December 31, 2016

315. तुमने ही दुर्दिन दिए

315. तुमने ही दुर्दिन दिए रे विधना

तुमने ही दुर्दिन दिए रे विधना,
तुम ही होउ सहाय जी।
किस विधि प्रीतम से मिलूँ रे विधना,
कछु तौ देउ बताय जी।

ऐसी' प्रीत  की आगरी रे गोरी,
लिख न करारे बोल जी।
रच-रच के आँखर लिखो रे गोरी,
धरउ करेजा खोल जी।

काहे की पाती करूँ रे सुअना,
काहे'  की' कलम दबात जी।
काहे की स्याही करूँ रे सुअना,
कछुह समझ नहिं आत जी।

चुनर फारि पाती करो रे गोरी,
अँगुली कलम-दबात जी।
हियरा की बातें लिखो रे गोरी,
जो मन आबत-जात जी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.12.2016
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Friday, December 30, 2016

313. काहे का यौवन अरे (कुण्डलिया)

काहे  का  यौवन  अरे,  काहे  का   रँग - रूप।
माटी  में  इक दिन  मिलें, चारण हों  या  भूप।
चारण हों  या भूप,  काल  सबको  है भखता।
सद्कर्मों के बिना, याद जग  किसको रखता।
राजपाट, धन-धान्य,  व्यर्थ पद, वैभव, गौधन।
बिना  लोक  कल्याण, अरे  काहे  का  यौवन।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.12.2016
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312. नख़रे मत दिखला अरे (कुण्डलिया)

नख़रे मत  दिखला अरे, ओ  नखरीली नार।
भृकुटी  ये खंजरनुमा, होय  जिगर के  पार।
होय जिगर के पार,  तीर  सी  तेरी चितवन।
ऊपर  से  मुस्कान, करे है  घायल  तन-मन।
हाँ करके फिरजाय, बात ये  दिल में अखरे।
ओ  नखरीली  नार,  दिखा मत  ऐसे नख़रे।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.12.2016
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Saturday, November 12, 2016

293. जनता क्यों समझे नहीं (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

जनता क्यों समझे नहीं, अफवाहों की चाल।
जरा-जरा  सी  बात  पर,  हो  जाती  बेहाल।
हो जाती बेहाल, समझ सच क्यों नहिं पाती।
बीस रुपे  की  चीज, पाँच  सौ  में  ले जाती।
महामूर्ख का काम  ठीक  से कब  है  बनता।
अफवाहों को समझ, अरे ओ भोली जनता !

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Monday, October 31, 2016

288. रोशनी के पर्व पर (मुक्तक)

रोशनी के पर्व पर,  प्रभु   से  यही  है  कामना।
प्रेम,  करुणा, त्याग  से,  परिपूर्ण  हो  हर भावना।
दूर नफरत हो दिलों से, हर किसी का ख्याल हो।
शांति हो चहुँदिश धरा पर, यह जगत खुशहाल हो।।

रणवीर सिंह "अनुपम"
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Sunday, October 02, 2016

285. आज समझ में आया होगा (मुक्तक)

आज  समझ  में आया  होगा,  इन आतंकवादियों को।
हिंद  कुचलना  भी  जाने  है,  कायर  उग्रवादियों  को।
भूल  दुबारा जो  की  इनने,  करनी  वरण  मृत्य होगी।
आँख उठाकर फिर से देखा, जो इन शांत वादियों को।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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284. कान खोलकर सुने पड़ोसी (मुक्तक)

कान खोलकर सुने पड़ोसी, सुन  लें सारे आतंकी।
बहुत हो गया नहीं चलेगी, छदम युद्ध की  नौटंकी।
शठ से कैसे निपटा जाता यह भी  नीत हमें आती।
हम वो हैं नरसिंह फाड़कर रख देते रिपु की छाती।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Tuesday, September 27, 2016

283. बंदर पाकर उस्तरा (कुण्डलिया)

बंदर   पाकर   उस्तरा,  काटेगें   निज   नाक।
झूठ  कहावत  ये  हुयी,   बन्दर  हैं   चालाक।
बन्दर   हैं   चालाक,   काटते   हैं  अब   जेबें।
दिखा  उस्तरा   हमें,   हमारा   सब   ले  लेबें।
होकर के  हुशियार,  बन  गये आज  कलंदर।
कैसे    रहे   नचाय,  देश  को  शातिर   बंदर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Thursday, September 15, 2016

282. दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी

लावणी छंद:

दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी, शत-शत करते नमन तुन्हें।
त्याग, शौर्य, बलिदान, धर्म का, पाठ पढ़ाया आप हमें।
'तेगबहादुर' पिता आपके, माता 'गुजरी' जन्म दिया।
शूरवीर, कवि, देशभक्त बन, मानव हित में कर्म किया।

जातिपाँति से ऊपर उठकर, सब को ही सम्मान दिया।
देश-धर्म की खातिर अपने, पुत्रों का बलिदान किया।
"सवा लाख से एक लड़ाऊँ", ऐसा नारा आप दिए।
"चिड़ियों से मैं बाज तड़ाऊँ" मन में दृढ़ विश्वास लिए।

वर्ष बियालिस रहे धरा पर, मानवता के काम किये।
कलगीधर, दशमेश आपको, जनता ने उपनाम दिये।
पंथ खालसा आप चलाया, दसवें गुरु प्रभु आप बने।
ऐसे महावीर योद्धा को, धरती सदियों बाद जने।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Sunday, September 04, 2016

281. समय बड़ा है सृष्टि में (कुंडलिया)

समय बड़ा है सृष्टि  में, सब कुछ  इसके  हाथ।
बुद्धि होत विपरीत तब, समय न हो जब साथ।
समय न  हो जब साथ, हिरन  सोने  का  लागे।
लुटी  गोपियाँ   हाय,    धनुर्धर   अर्जुन   आगे।
जग से  सब  लड़ लेंय, समय से कौन लड़ा है।
परमेश्वर   के  बाद,  सृष्टि  में   समय  बड़ा  है।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Friday, September 02, 2016

280. गोरी पर्दा को हटा (कुण्डलिया)

गोरी  पर्दा  को   हटा,  अम्बर  रही   निहार।
लालवर्ण की  कंचुकी,  लँहगा,  चुनरी  धार।
लँहगा, चुनरी  धार,   लगे  ज्यों  कोई  मूरत।
भूल  गई  संसार, जगत  की   नहीं जरूरत।
शांतचित्त, दिन मध्य,  ढूँढ रहि चाँद चकोरी।
मन  में  ले  विश्वास,  देख  रहि  मारग गोरी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'

Thursday, September 01, 2016

279. चैन नहीं दिन रात हमें (मत्तगयंद सवैया)

279. मत्तगयंद सवैया
भगण (211)x 7 बार +2 दीर्घ

चैन नहीं दिन रात हमें सखि, कौन स रोग लगो इ हिया में।
नीर बिना जस मीन करै जस बाति करै बिन तेल दिया में।
कौन सि व्याधि लगी हमकूँ दिन रात समाय रही हुँ पिया में।
प्रीतम काहे कुँ प्राण हरौ मम, काहि कुँ आग लगात जिया में।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Sunday, August 28, 2016

एक दोहा और

मानवता  मृतप्राय  सी,  निष्ठुर  हुआ  समाज।
इकला पति ही ढो रहा, पत्नी का  शव आज।
रणवीर सिंह 'अनुपम'

Saturday, August 27, 2016

278. तुम्हारी चाह में कितनो (मुक्तक)

तुम्हारी चाह  में  कितनो  को' भटकते  देखा।
गुलों  के दिल  में  एक  खार  खटकते  देखा।
उस समय चाँद ने, जानी है हकीकत अपनी।
जब तुम्हें गाल से, ज़ुल्फों को  झटकते देखा।

रणवीर सिंह 'अनुपम'

Saturday, August 20, 2016

277. सखी री लागो सावन मास (श्रृंगार छंद)

श्रृंगार छंद

सखी  री   लागो   सावन   मास।
नहीं  कुछ  उन  बिन आवे  रास।
पड़े  जब  तन  पर जल  बौछार।
लगे   ज्यों   बरसत   हों  अंगार। 

विरह  की  अग्नि  जलाती  गात।
धधकती  हियरा  में   दिन - रात।
छोड़कर,  प्रियतम   गए  विदेश।
नहीं     आया     कोई    सन्देश।

करे  है  पिउ-पिउ  बन  में  मोर।
कुयलिया  रह - रह  करती शोर।
विरह   से   व्याकुल  हूँ   बेहाल।
पिया  नहिं   जानत   मेरो  हाल।

काह  नहिं  लेते  हो सुधि  आय।
रहे   पाती   से   दिल  बहिलाय।
बहे   नयनों   से   निशदिन  नीर।
सजन   कब  आय   हरोगे  पीर।

लगा  यह   कैसा  मुझको   रोग।
सहा  नहिं  जाता   और  वियोग।
मिलन को  मनवा  रहत  अधीर।   
धरूँ  अब    कैसे   आली   धीर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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276. छेड़िये मत आप यूँ

मापनी-212  2212  212  2212

छेड़िये  मत आप  यूँ  जज्बात  को।
और  सह  सकता नहीं आघात को।

रहनुमा  जिसको समझता  मैं  रहा,
उसने   ही  लूटा   मेरी  बारात  को।

पूँछिये  मत  साथियो  मेरी  व्यथा,
क्या बताऊँ क्या हुआ उस रात को।

माँगने  से  हक़  मिला  करता  नहीं,
आइये  हम  दें  बदल  हालात को।

इक तरफ भोजन फिके तालाब में,
इक तरफ बच्चे बिलखते भात को।

मान  लूँ    कैसे   तुम्हें   मालूम   ना,
जानता  सारा  जहाँ  जिस बात को।

हैं बहुत  मुश्किल यहाँ  पहिचानना,
आदमी  को, आदमी की जात  को।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Friday, August 19, 2016

275. सच कहता हूँ मात (रोला)

रोला  छंद

सच कहता हूँ मात, नहीं कुछ आता मुझको।
माता  होउ  सहाय,  पुत्र  यह ध्याता तुझको।
शांति चित्त माँ  करो, दुखों  से  मुझे  उबारो।
तुम हो तारणहार, मात निज सुत  को  तारो।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Thursday, August 18, 2016

274. तूँ जहाँ भी हो बहन (मुक्तक)

गीतिका छंद -2122  2122  2122  212

तूँ  जहाँ भी  हो बहन, किरपा करें दामोदरा।
विघ्न  पथ  से  दूर  हों,  बाधा  हरें  लंबोदरा।
दूर  दुख  तुझसे  रहें, प्रभु  से  यही  प्रार्थना।
लाड़ली  तूँ  खुश रहे, मेरी  यही  है  कामना।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Sunday, August 14, 2016

273. अंग्रेजी तोपों के सम्मुख (मुक्तक)

लावणी छंद

अंग्रेजी  तोपों के सम्मुख, जिनने  सीना  तान दिया।
आजादी की खातिर जिनने, निज प्राणों का दान दिया।
उन  मतवाले  वीरों  की  उस,  कुर्बानी  का  ध्यान  रहे।
हाथ  तिरंगा  औ  होंठों  पर, भारत  का  जयगान रहे।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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272. ताकती हर आँख को अब

ताकती  हर आँख को अब, राख  होना चाहिए।
हिन्द का  हर एक दुश्मन, ख़ाक  होना  चाहिए।
ये  लचीलापन   हमारा,  ले  गया  कांधार  तक।
एक  गलती के  लिए, जाना  पड़ा गांधार  तक।

हो गया संसद पे' हमला,  पर  रहे  खामोश हम।
आज तक  चेते नहीं   हैं,  नींद  में   बेहोश  हम।
ताज भी छोड़ा नहीं,  छोड़ा  न  अक्षरधाम  को।
समझता कमजोरियत रिपु, शांति के पैगाम को।

है जरूरत  अब पड़ोसी,  को  कड़े  संदेश  की।
धैर्य  की  भी  एक  सीमा,  है   हमारे  देश  की।
अब जरूरी हो गया है, नाश हो  इस  पंक  का।
खात्मा अब  है  जरूरी,  हिन्द  से  आतंक का।

किस  तरह  से  राजनेता,  हो  रहे  धनवान  यूँ।
बाहुबलियों डाकुओं की, बढ़ रही क्यों शान  यूँ।
इन सभी की इस तरक्की,का भी' पर्दाफाश हो।
भ्रष्टता,  कालाबज़ारी,   का  यहाँ  से  नाश  हो।

धार्मिक  उन्माद का  विष, भर  रहे  हैं  रक्त  में।
कौन सा अवगुण नहीं  है, धर्मगुरुओं, भक्त  में।
शत्रु हो जो भी वतन का, वो नहीं अब माफ हो।
है जरूरी हर किसी  के, साथ अब  इंसाफ  हो।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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271. मेंहदी काजल से कहे (कुण्डलिया)

कुण्डलिया छंद

मेंहदी  काजल   से   कहे,  काहे    होत  अधीर।
तेरी   मेरी    एक   गति,    एक    हमारी    पीर।
एक   हमारी   पीर,   सजन    आ    इसे   हरेंगे।
लखकर,  छूकर,  चूम,   दर्द   सब   दूर   करेंगे।
यह सुन  माहवर  कहे,  हो  रही   काहे  पागल।
मन  मत  करो  मलीन,  अरे ओ मेंहदी काजल।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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Wednesday, August 10, 2016

270. प्रेम   है   आराधना (मुक्तक)

मापनी- 2122 2122, 2122 212
(गीतिकाजी गीतिकाजी, गीतिकाजी गीतिका

गीतिका छंद

प्रेम   है   आराधना,  अधिकार   मैं   कैैसे  कहूँ।
दो तनों  की  वासना  को  प्यार   मैं   कैसे  कहूँ।
पश्चिमी  उन्मुक्तता  से   कौन  सा   मैं  ज्ञान  लूँ।
छल-कपट को प्रीत  का, आधार  कैसे  मान लूँ।

मुक्तक

प्रेम   है   आराधना   अधिकार   मैं   कैैसे   कहूँ।
दो तनों  की  वासना  को  प्यार   मैं   कैसे  कहूँ।
त्याग, निष्ठा और  निश्छल भावना को छोड़कर।
छल-कपट को प्रीत  का  आधार  मैं  कैसे  कहूँ।

रणवीर सिंह (अनुपम)

Sunday, August 07, 2016

269. वो मर गए तो क्या हुआ

हम मर गए तो क्या हुआ, वो बच गए तो क्या हुआ।
मुझसे बदतर हाल यारो, है यहाँ सब का हुआ॥

डर के' आगे सच को' कहने, की बची हिम्मत कहाँ,
आदमी अब तो यहाँ पर, इस कदर सहमा हुआ॥

राहजन से ये पुलिस, काहे बचाएगी हमें,
हर कदम पर खुद इसी का, जाल है फेंका हुआ॥

बेगुनाही अब यहाँ पर, किस तरह साबित करूँ,
आज जब मुंसिफ ने खुद को, है यहाँ बेचा हुआ॥

अब अदालत पर भरोसा, बात बेमानी लगे,
फैसला देखा है' हमने, पहले' से होता हुआ॥

जो नशाबंदी का मसला, ले गया हर मंच पर,
आदमी वो खुद नशे में, आज है डूबा हुआ॥

चाहिए होना था जिसको, बंद कारागार में,
शक्स वो संसद भवन में, है मिला बैठा हुआ॥

बाद मरने के यहाँ, कहते हैं उसको जीनियस,
जिसको देखा जिंदगी भर, फ़ेल ही होता हुआ॥

करके तिकड़बाजियाँ जो, जिंदगी जीता रहा,
लोग कहते महात्मा है, वो बहुत पहुँचा हुआ॥

जिसके हाथों अब तलक, हर रोज ही लुटता रहा,
फिर न जाने इश्क क्यों, 'अनुपम' उसी से है हुआ॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
                     *****

Sunday, July 31, 2016

268. मिला तुम सबका (श्रृंगार छंद)

श्रृंगार छंद

मिला तुम सबका  इतना  प्यार।
सभी का है मुझ पर  अधिकार।
साधना   करिये    रचिये    छंद।
पीजिये  कविता   का   मकरंद।

बहन सरिता, ममता  का  साथ।
शीश पर अनुभा  जी  का  हाथ।
समर्पित   यहाँ   प्रिय   अवधेश।
वहाँ "अनुपम" को  कौन क्लेश।

रणवीर सिंह 'अनुपम'

Saturday, July 16, 2016

265. मेघ भरी काली रातों में (गीत)

गीत

मेघ भरी काली रातों में,
अनजाना सा पहरा होता।
व्योम ताकते इन नयनों में,
अक्सर ख्वाब सुनहरा होता।।

आँखें मूँद, भूलना चाहूँ, 
फिर क्यों नींद नहीं आती।
करवट बदल-बदलकर यों ही,
रोज रात कटती जाती।

बेकल विरह वेदना से ये,
अंतर तपता सहरा होता।। 1

ख्वावों के उपवन में आकर,
कलिका बन खिल जाती है।
जब ये स्वप्न सुंदरी मुझको,
सपनों में मिल जाती है।

रात दिवाली हो जाती है,
अगला दिवस दशहरा होता।। 2

क्यों मीरा को विष मिलता है,
मजनूँ को पत्थर मिलते।
शीरी औ फरहाद सदा क्यों,
विरह वेदना में जलते।

प्रेम मार्ग क्यों इतना दुष्कर,
क्यों जग गूंगा-बहरा होता।। 3

मर्म भरी अनुराग की' बातें,
अनुरागी ही जान सके।
मुल्ला-पंडित धर्म के' ज्ञाता,
इसको कब पहिचान सके।

प्रेम में' सब कुछ सह जाता जो,
वो सागर से गहरा होता।। 4

रणवीर सिंह (अनुपम)
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Saturday, July 09, 2016

261. दिवाना मैं हुआ जब से (विधाता छंद)

दिवाना मैं  हुआ जब से, मुझे दुनियाँ न भाती  है।
हमारे  साँस  की  सरगम,  तुम्हारे  गीत  गाती  है।
कहाँ हो तुम प्रिये मेरी, मिलो इक बार तो आकर।
तुम्हारे  बिन कलम मेरी, मुझी  सी रूठ  जाती है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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Friday, July 08, 2016

260. जलाकर प्रेम का दीपक (मुक्तक)

विधाता छंद

विधाताजी  विधाताजी, विधाताजी विधाताजी
1222        1222,      1222       1222

जलाकर प्रेम का दीपक, बुझाओ मत इसे ऐसे।
बसाकर गैर को दिल में, सताओ मत मुझे ऐसे।
भुलाओगे  अगर   ऐसे,  हँसी  होगी  ज़माने में।
बनी जल्दी बिगड़ जाती, लगें सदियाँ बनाने में।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Saturday, July 02, 2016

259. बन्दर पकड़न हेतु जब (कुण्डलिया)

बंदर पकड़न हेतु जब, निकला इक फरमान।
गधी,  गधे  से  यूँ  कहे, भाग  चलो  श्रीमान।
भाग  चलो श्रीमान,  सुरक्षित  गलि-कूची में।
दर्ज  न  कर  दें  नाम,  कहीं  बंदर  सूची  में।
उम्र   गुजर   जायेगी,   सारी जेल  के अंदर।
साबित नहिं  कर सकें, गधे हैं  या हम बंदर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Saturday, June 25, 2016

258. धरती पानी के बिना (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

धरती   पानी   के   बिना,  सूख    हुई   बेहाल।
त्राहि त्राहि सब कर रहे, चहुँदिश पड़ा अकाल।
चहुँदिश   पड़ा  अकाल,  अरे  आ   वर्षा  रानी।
प्यासे  जो  मर   रहे,   इन्हें   दे   तू   जिंदगानी।
देख  तुझे   हुंकार   जिंदगी   फिर   से   भरती।
पा    तेरा   सानिध्य,   लहलहा  उठती   धरती।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Sunday, June 19, 2016

257. मंचों पर चिल्ला रहें (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

मंचों पर चिल्ला रहे, मिस्टर आमिर खान।
उनको भी  लगने लगा, संकट में  हैं  प्रान।
संकट में हैं प्रान, डरें  खबरों को पढ़ सुन।
भारत नहीं सहिष्षुण, रटें मंचों पर ये धुन।
कायर ओ  कृतघ्न,  शर्म  कर  प्रपंचों पर।
झूठे गाल बजात फिरे  क्यों  तूँ  मंचों  पर।

रणवीर सिंह (अनुपम)
*****

256. नेताओं  का  देख  तमाशा (मुक्तक)

नेताओं  का   देख  तमाशा, अह भारत!
चहुँदिश छाई घोर निराशा,  अह भारत!
सुरा    सुंदरी    वंशवाद   में    ये   डूबे।
इनसे क्या करनी है आशा,  अह भारत!

गुंडे चुन-चुन आज आ रहे, अह  भारत!
गधा  पचीसी  रोज  गा रहे, अह भारत!
जंगल, नदियाँ, खेत,खदानों को खाया।
ताबूतों   को   बेच  खा रहे, अह भारत!

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

255. पिता पर्वत सा होता है (मुक्तक)

255. पिता पर्वत  सा' होता है (मुक्तक)

पिता पर्वत-सा  होता  है, पिता  प्राचीर-सा  होता।
पिता  पुरुषार्थ  होता है, पिता  तक़दीर-सा होता।
पिता घर  की  व्यवस्था  है,  पिता  घर  की सुरक्षा है।
पिता एक ढाल-सा होता, पिता शमशीर-सा होता।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Saturday, June 18, 2016

254. भोग की ये दासता (कवित्त)

कवित्त

भोग की ये दासता विलासता को छोड़कर,
जिंदगी में सादगी की, शान होनी चाहिए।

बड़े-बड़े ख्वाब और, बड़ी नीतियाँ ही नहीं,
कर्म  संग सोच भी  महान  होनी  चाहिए।

भिन्न-भिन्न भाषा-प्रांत, भिन्न खानपान किन्तु,
एक  राष्ट्रगान  एक, तान   होनी  चाहिए।

एक  हिंद  देश  और,  एक  संविधान  अब,
एकता  हमारी  पहचान   होनी   चाहिए।।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Saturday, June 11, 2016

252. ये बिस्तर की जिंदगी (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

ये  बिस्तर  की  जिंदगी, नहिं उमंग नहिं  चाव।
नस्तर सी निशदिन चुभे, करती  मन  में  घाव।
करती  मन   में   घाव,  शराफत  नोंचे   खाये।
गिरें  कीच  में  आय,  लाज  इनको नहिं आये।
कभी  लसलसी लगे,  कभी  लागे  प्रस्तर सी।
जिस्मों  का  बाजार,  जिंदगी  ये  बिस्तर  की।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Friday, June 10, 2016

249. रोटी है मसला यहाँ (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

रोटी  है मसला  यहाँ, इसकी करिये  बात।
मंदिर मस्जिद में  हमें, काहे  को उलझात।
काहे  को उलझात, पेट नहिं इससे भरता।
उदर भरा हो तभी भजन पूजन भी करता।
भूख  समस्या  बड़ी,  शेष  बातें  हैं  छोटी।
भूखों  का  भगवान, सिर्फ  होती  है  रोटी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Thursday, June 09, 2016

248. खाली बातों से नहीं (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

खाली बातों से नहीं, हो सकता  कल्याण।
कब तक खाली पेट में,  फूँकेंगी  ये  प्राण।
फूँकेंगी  ये  प्राण, जोश आएगा कब तक।
राष्टवाद, जयगान, कौन गायेगा कब तक।
धर्मों की जयकार, और  नहिं  होने  वाली।
रोटी है भगवान, उदर  जिनका  है खाली।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

247. जिसकी खाली जेब है (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

जिसकी  खाली  जेब  है, वह  जीवन बेकार।
टुकुर-टुकुर  हर  चीज को, देखे  बीच बजार।
देखे  बीच बजार,  मारकर  मन   रह  जाता।
कोसत, खीझत और, भाग्य पर  है झल्लाता।
'अनुपम'   बनो  समर्थ,  बुरी   होती कंगाली।
उसको  पूछे कौन, जेब  हो  जिसकी  खाली।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
*****

Sunday, June 05, 2016

246. जो वस्त्र बनूँ, तो हो किस्मत

जो वस्त्र बनूँ, तो हो किस्मत,
सीने से उनके लगा रहूँ,
जो धातु बनूँ बंदूकों सँग,
कंधों पर उनके टँगा रहूँ॥

जो चाम बनूँ तो हे हरि मैं,
जूतों में उनके सजा रहूँ,
जो बनूँ अगर ककड़ पत्थर,
उस पगडंडी पर पड़ा रहूँ॥
 
जिस पर मतवाले वीरों की,
टोलियाँ गुजर कर जातीं हों,
या फिर बेखौप शहीदों की,
डोलियाँ गुजर कर जातीं हों॥
रणवीर सिंह (अनुपम)              
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Sunday, May 22, 2016

245. संस्कार आदर्श मिट गए (गीत)

गीत (16/14)

संस्कार आदर्श मिट गए,
अब इस नए ज़माने में।
नेकी औ ईमान बिक गए,
अपना काम चलाने में॥

नया  जोश अब, नई  उमंगें,
नई सभ्यता  है आई,
आज  सभ्य लोगों ने ली है,
नंगे  होकर अँगड़ाई।

क्या-क्या मिले देखने को अब,
यारो नए जमाने में॥ 1

आज जवानी बनी हुई  है,
पर्दों का बस आकर्षन।
आज खुली जंघाएं लेकर,
इठलाता  फिरता यौवन।

यौवन गर्वित हुआ झूमता,
अपनी देह दिखाने में॥ 2

टुन्न चमेली पौआ पीकर,
मुन्नी भी बदनाम फिरे, 
औ मुन्नी वो काम कर रही,
जो न झंडू बाम करे।

पर्दे पर यों दिखें नारियाँ,
आती लाज बताने में॥ 3

नंगे होकर ट्रांजिस्टर  संग,
आमिरखाँ प्रचार करे, 
वस्त्र त्यागकर आज सभ्यता,
लोगों को हुशियार करे।

जिस्मों का उपयोग हो रहा,
अब  बाजार बढ़ाने  में॥ 4

रणवीर सिंह (अनुपम)
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Sunday, May 15, 2016

244. आप को देखा है' जब से (गीत)

गीत (14/12)

आप को देखा है' जब से,
मन मे'रा बेकल हुआ।
पर तुम्हारा कल कभी नहिं,
आखिरी है कल हुआ।।

मिलने' को हूरें हजारों,
रोज ही मिलतीं रहीं।
सैकड़ों सुकुमारियाँ भी,
संग में चलतीं रहीं।

पर तुम्हारी सादगी पर,
दिल मे'रा पागल हुआ॥ 1

रूप भी निखरा लगे है,
और  रंगत छा गई।
चाल भी मदमस्त, तन में,
कुछ लचक है आ गई।

बढ़ गई पैरों की' रौनक,
जब से' मैं पायल हुआ॥ 2

घाव हँस-हँस खा रहा हूँ,
आह भी करता नहीं।
दर्द भी जाता नहीं औ,
जख्म भी भरता नहीं।

कैसी' ये तेरी नजर है,
जिससे' दिल घायल हुआ॥ 3

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Saturday, April 30, 2016

242. माँ - महल,  झोपड़ी,  झुग्गी (मुक्तक)

माँ

शिशु नौ मास उदर में रखकर, क्या-क्या कष्ट उठाती माँ।
उलटी, मिचली घबराहट सब, हँसकर के सह जाती माँ।
त्याग,  समर्पण,  सहनशक्ति   का,  नाम  दूसरा  है  माता।
झेल  भयानक  प्रसव पीड़ा, शिशु को जग  में लाती माँ।

अंधा,  बहरा,  लूला,  लँगड़ा,  सबको अंक  लगाती माँ।
पहले  पूरे   घर  को  देती,   स्वयं  बाद   में  खाती   माँ।
बच्चों की फरमाइश खातिर, निज पति से लड़ जाती है।
छोटी - छोटी  आमदनी  में,  घर  को  रोज  चलाती  माँ।

महल,  झोपड़ी,  झुग्गी,  तम्बू,  सब  बैकुंठ  बनाती  माँ।
जाने  कितनी  बाधाओं  से,  हर  दिन  है  टकराती  माँ।
देवी बनना  बहुत  सरल  है,  माँ से इसकी  क्या तुलना।
करती जब  सर्वस्व निछावर,  तब जाकर  बन पाती माँ।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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Saturday, April 23, 2016

241 भृकुटी तनी कमान सी (दोहा)

भृकुटी तनी कमान सी, अँखियाँ है तूणीर।
नजर कटीले वाण सी, रही कलेजा चीर।।

कभी बेचता चाय  तो,  सेवक, कभी  किसान।
कभी  कहे  मजदूर  हूँ, सच क्या कहो प्रधान ?

रणवीर सिंह "अनुपम"

Sunday, April 17, 2016

240. इस कदर आप  मुझको (मुक्तक)

मापनी-212  212  212  212
(स्रग्विणी स्रग्विणी स्रग्विणी स्रग्विणी)

इस कदर आप  मुझको न तड़फाइये।
आज  की शाम को, अब चले आइये।
तोड़कर  दिल   हमारा  मिलेगा  क्या?
बात  इतनी  सी' मुझको बता जाइये।।

रणवीर सिंह "अनुपम"
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Sunday, April 10, 2016

239. कुत्तों  ने  बैठक  करी (कुण्डलिया)

कुण्डलिया

कुत्तों  ने  चर्चा  करी,  अपना  भी  हो  राज।
राजनीत  में भी बढ़े, अपना  कुकुर  समाज।
अपना कुकुर समाज, चचा, ताऊ औ भ्राता।
दे-दे  सबको टिकट,  बनाओ, भाग्यविधाता।
लीनी   जनता   घेर,   गँवार   कुकरमुत्तों  ने।
हाल  किया बेहाल,  देश  का  इन  कुत्तों  ने।

रणवीर सिंह "अनुपम"
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Sunday, April 03, 2016

238. सब यहाँ फूलें-फलें (मुक्तक)

सब  यहाँ   फूलें-फलें,  प्रभु  से  यही  है  कामना।
प्रेम,  करुणा, त्याग  से,  परिपूर्ण  हो  हर भावना।
व्याधि से हो मुक्त प्राणी, हर किसी का ख्याल हो।
शांति हो चहुँदिश धरा पर, ये जगत  खुशहाल हो।

रणवीर सिंह "अनुपम"
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Friday, March 25, 2016

237. राधा-मुख पर कृष्ण ने (कुण्डलिया)

कुण्डलिया छंद

राधा-मुख पर कृष्ण ने, जिस क्षण मला गुलाल।
गौरवर्ण   की   राधिका,  हुई   लाज   से  लाल।
हुई  लाज   से  लाल,   लगे   पत्थर  की  मूरत।
किंकर्तव्यविमूढ़,  लखे   कान्हा     की    सूरत।
आधे तन  में  श्याम, लगे तन  ख़ुद  का  आधा।
यह  कैसा   संबंध,   सोचती    मन    में   राधा।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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236. आज शहीदी दिवस दोस्तों (मुक्तक)

आज शहीदी दिवस दोस्तों, भगत सिंह से वीरों का।
राजगुरू, सुखदेव सरीखे, वतनपरस्त  फकीरों का।
जब भारत की, महाघोष  की  ये  हुंकारें  भरते  थे।
गोरे अफसर इनके डर से, थर-थर काँपा करते थे।।

आजादी की खातिर इनने, हँस-हँस के बलिदान दिया।
भारत  के  तीनौ  बेटों   ने,  एक  साथ  प्रस्थान  किया।
इन  मतवाले  वीरों  की  इस,  कुर्बानी  का  ध्यान  रहे।
हाथ  तिरंगा  औ  होंठों  पर, भारत  का  जयगान रहे।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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235. होली- गगन व्याकुल लगे दिखने

235. होली-14/14

1222    1222     1222    1222

गगन व्याकुल लगे दिखने, समझ लो फ़ाग आया है।
धरा भी जब लगे सजने, समझ लो फ़ाग आया है।

शिशिर की हो विदाई जब, लगे ऋतुराज की आहट,
हरारत सी  लगे  बढ़ने,  समझ लो फ़ाग आया  है।

खुमारी जब लगे छाने, बढ़े जब देह में मस्ती,
हिलोरें मन लगे भरने, समझ लो फ़ाग आया है।

कभी इस फूल के आगे, कभी उस फूल के आगे,
भ्रमर गुंजन लगें करने, समझ लो फ़ाग आया है।

किसी अलि के निवेदन पर, मचलकर जब नई कलिका,
स्वतः ही जब  लगे  खिलने, समझ  लो  फ़ाग आया है।

कपोलों  पर   दिखे   सुर्खी,   खिले  अधरों  पे  अरुणाई,
झुकी  नजरें  लगे  उठने,  समझ  लो   फ़ाग  आया  है।

बिना   श्रृंगार   के   पत्नी,   लगे   प्रतिरूप   रंभा   का,
रती  सी  जब   लगे  लगने, समझ  लो  फ़ाग  आया है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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(पुरानी रचना)

गगन व्याकुल लगे दिखने, समझ लो फ़ाग आया है,
धरा दुल्हन सी जब दीखे, समझ लो फ़ाग आया है।

शिशिर की हो विदाई जब, लगे ऋतुराज की आहट,
हरारत सी लगे बढ़ने, समझ लो फ़ाग आया है।

फिजां रंगीन हो जाये, पवन मदहोश हो जाये,
चराचर जब बहक उट्ठे, समझ लो फ़ाग आया है।

पुराने पीत पातों के, वसन को दूर करके जब,
विटप पर कोपलें फूटें, समझ लो फ़ाग आया है।

सजाकर देह को अपनी, नवेली फूल-कलियों से,
लता जब वृक्ष से लिपटे, समझ लो फ़ाग आया है।

किसी अलि के निवेदन पर, मचलकर जब नई कलिका,
स्वतः पट  खोलने लागे, समझ लो फ़ाग आया है।

कभी इस फूल के आगे, कभी उस फूल के आगे,
भ्रमर गुंजन लगें करने, समझ लो फ़ाग आया है।

खुमारी जब लगे छाने, बढ़े जब देह में मस्ती,
हिलोरें मन लगे भरने, समझ लो फ़ाग आया है।

किसी की दृष्टि पड़ने से, चमक आँखों में आ जाये,
कदम नर्तन लगें करने, समझ लो फ़ाग आया है।

करें हुड़दंग जब बच्चे, लिए हाथों में पिचकारी,
कुलाँचें भर उठें बुढ्ढे, समझ लो फ़ाग आया है।

कपोलों पर दिखे सुर्खी, खिले अधरों पे अरुणाई,
नज़र चंचल लगे होने, समझ लो फ़ाग आया है।

बिना श्रृंगार के पत्नी, लगे प्रतिरूप रंभा की,
रती सी जब लगे लगने, समझ लो फ़ाग आया है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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