Monday, April 27, 2015

35 "बात आज करनी ही होगी"

बात न करिए आज यहाँ पर, मॉलों और दुकानों की।
करनी है तो बात करो तुम, खेती औ खलिहानों की।।
 
छोटे दिल में कहाँ जगह है, कोठी, बंगला, गाड़ी की,
मुझ गरीब के आगे तुम मत, करिए बात खजानों की।।
 
आज किंगफिशर, चड्ढाओं का, फ़ैल रहा रुजगार यहाँ,
गाय, दूध की बात न करते, करते हो मयखानों की।।
 
इंसानों के साथ भी रहकर, जो इन्सान न बन पाए,
वो ही करते बात फिरें अब, गीता और कुरानों की।।
 
बल्ला कंदुक से खेलें जो, वो सब के हक़दार हुए,
जो जानों पे खेल रहे हैं, फिक्र न उन्हीं जवानों की।।
 
जो जाकर के वोट न देते, सरकारें उनकी बनतीं,
संसद में चर्चाएं होती, उनके लिए विधानों की।।
 
बात गरीबों, मजदूरों की, काहे नहिं तुमसे होती,
सच्चे दिल से बात कभी नहिं, करते आप किसानों की।।
 
जिधर देखिये चर्चे होते, लम्फट के वाचालों के,
बात कभी भी नहिं होती है, यारो बंद जुबानों की।।
 
बात हो रही है दंगों की, दंगा करने वालों की,
बात नहीं करता है कोई, जख्मों और निशानों की।।
 
फिक्र किसे हरिया, घीसू की, जो धरती में समां गए, 
फ़िक्र सभी को बँटवारे की, कोयला और खदानों की।।
 
देह चमेली औ मुन्नी की, आँख फाड़कर देख रहे,
हाथ न देखे लजवंती के, करे रोपाई धानों की।।
 
बहुत हो चुकी महल की बातें, उनमें रहने वालों की,
बात झोपड़ी की करिए अब, कच्चे, खसे मकानों की।।
 
बात आज करनी ही होगी, शोषित और गरीबों की,
बात छोड़िये मक्कारी की, झूठे नए बहानों की।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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34 बड़ी ही खूबसूरत हैं अजी ये

बड़ी ही खूबसूरत हैं, अजी ये आप की ऑंखें,
न जाने देखतीं हैं क्या, अजी ये आपकी आँखें।।
बड़ी गंभीर चितवन से, लगाकर ध्यान इस तरह,
न जाने सोचतीं हैं क्या, अजी ये आपकी आँखें।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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33 ज्यों आसमां को छोड़कर

ज्यों आसमां  को छोड़कर, सागर में  उतरी  हो परी।
जल में  किसी ने  दी बिठा,  मूरत  कोई  संगमरमरी।
निज  अंक  में ले  हंस  को,  चादर  लपेटे  नीर  की।
लहरों के संग अठखेलियाँ, करती हुई कोई जलपरी।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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32 पूरा का पूरा सना हुआ (गीत)

पूरा का पूरा सना हुआ, कीचड़ में कुर्ता खादी का।
भ्रष्टाचारी, हत्यारों का, संरक्षक कुर्ता खादी का॥
 
घर इनके हैं आरामगाह, गुंडे, बदमाश, डाकुओं की,
लोहूलुहान है लोकतंत्र, खा-खाकर मार चाकुओं की,
हर नेता आज लगे हमको, चाचा-ताऊ सैय्यादी का॥
 
खद्दरधारी, ब्योरोक्रेटिक, खटमल बन देश को चूँस रहे,
गोरी, तैमूर के ये वंशज, सरकारी पैसा लूट रहे,
सरकारी दफ्तर में देखो, आलम धन की बर्वादी का॥
 
मेहनत की पसलियां हैं दिखतीं, और कमर झुकी है यौवन की,
नंगे, भूखे बच्चे बिलखें, व्याकुल है हालत बचपन की,
अब तक न बुढ़ापा समझ सका, क्या मतलब है आजादी का॥
 
ज्यादा न झुका नाजुक डाली, ये टूट गई तो क्या होगा?
जो गाँठ सब्र की बांधी है, वह छूट गई तो क्या होगा?
न लावा बनकर फूट पड़े, अंर्तद्वंद फरियादी का॥
 
जो आज माँगते हक अपना, वो कल तेरा हक छीनेंगे,
जो आज प्यासे पानी को, कल खून तुम्हारा पी लेंगे,
नहीं एक तमाचा सह सकते, भूखी शोषित आबादी का॥
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31 तुम्हारा बाप लगता हूँ

ज़माने को जरा समझो, तुम्हारा बाप लगता हूँ।
अनाड़ी मत हमें समझो, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
जो ठोकर खाई हैं हमने, वो तुमको भी न लग जाये,
तजुर्बों को बताता हूँ, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
हमें मालूम इज्जत क्या? औ इसका ओहदा है क्या?
बचाकर के इसे रखिये, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
जिसे तुम चाहते पाना, न पीछे भागिए उसके,
वो उतना और भागेगा, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
बनो खुद्दार और खुद में, करो खुद्दारियां पैदा,
हुश्न खुद घर पे आएगा, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
ये लोधी गार्डन देखा, वो बुद्धा गार्डन देखा,
वहाँ क्या-क्या न देखा है, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
वहाँ नगों को देखा है, खुले अंगों को देखा है,
गिरा इन्सान देखा है, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
हमीं से सीखकर पश्चिम, हमें क्या-क्या सिखाता है,
अजी क्या सीखना उससे, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
जो पश्चिम अब सिखाता है, वो सीखा है युगों पहले,
चलो चलते हैं खजुराहो, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
ज़माने में भी रह करके, ज़माने में न तुम रहना,
असल है जिंदगी ये ही, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
जो कहता हूँ, वो करता हूँ, जो बोला है, निभाया है,
यही है ज़िन्दगी मेरी, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
 
कहीं पर जा के तुम बैठो, कहीं पर जा के तुम ढूँढो,
न मुझसा देख पाओगे, तुम्हारा बाप लगता हूँ।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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30 राजपथ उनको दिया गया

राजपथ उनको दिया गया।
जिन्हें चलने का नहीं सऊर॥
 
चुराएँ मुख सच्चाई से,
लोग डरते अच्छाई से,
झूठ की कर रहे जय-जयकार,
आज का कैसा ये दस्तूर॥
 
बताएं खुद को वो मेहताब,
लिए कुम्लाहा चेहरा जो,
बात सूरज की करते है,
नहीं जुगुनूँ के जितना नूर॥
 
रूप पर इतराना न ठीक,
हुश्न पर इठलाना न ठीक,
जवानी दो दिन की मेहमान,
अजी क्यों रहतीं इतनी दूर॥
 
झुकाते क्यों नज़रें हमसे,
घुमा लेते क्यों अपना मुँह,
चुराओगे कब तक आँखें,
चार तो होंगीं कभी जरूर॥
 
हमीं को हँस-हँस के चूँसें,
हमीं से यौवन सुख लूटें,
हमारे बल के ही बल पर,
रहा करतीं हो यों मगरूर॥
 
समर्पण तुम करतीं हो तो,
बिठा के सर पर रखते हम,
तुम्हारी इज्जत ही तो है, 
हमारा सबसे बड़ा गुरूर ॥
 
तुम्हारी अस्मत की खातिर,
महाभारत तक करते हम,
पुरुष, पुरुषों से लड़ मरता,
सोचिए कुछ तो अजी हुज़ूर॥

किसी को अपचन हो जाता,
कहीं टुकड़ा न मिल पाता,
किसी को नहीं धतूरा फल,
किसी को मिलते हैं अंगूर॥
 
नहीं पैसा तो प्यार नहीं,
बिना इसके घर-वार नहीं,
आज पैसे में वो ताकत,
गधे को मिल जाती है हूर॥
 
मुखौटे हैं सब के मुख पर,
किसी पर करे भरोसा क्या,
पुलिस, गुंडा, नेता मिलकर,
देश को लूट रहे भरपूर॥
 
करें उल्लू आयोजन अब,
टिटहरी करती कविता पाठ,
काग के भाषण पर वाह-वाह,
हंस करने को हैं मजबूर॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
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29 उजाले में निकलें तन

उजाले में निकलें, तन उनका सुलगता है,
चाँदनी में निकलें, मुख उनका झुलसता है,
जब भी हँसें तो लगता, चूड़ी खनक रही है,
गुनगुनाएँ ऐसे, ज्यों सारंगी बज रही है॥
 
पंखे की हवा में, तन उनका लचक जाये,
मूली को सूँघ लें तो, सौ बार छींक आये,
दौड़ लगायें तो, चीटी से पिछड़ जायेँ,
एवरेस्ट चढ़ गईं, गर छत पे पहुँच जायेँ॥
 
दही को जब वो खाते हैं, तो उनके दाँत हिलते हैं,
रखें जब पैर मख़मल पर, तो उनके पैर छिलते हैं,
उँगलियाँ हिलने लगतीं हैं, अगर एक काज सिलते हैं,
हथेली इस तरह कोमल, कि दो फुल्के न बिलते हैं॥
 
जीभ झुलस जाती है, लस्सी की तपन से,
कमर दुखने लगती है, साड़ी के वजन से,
दर्दे कलाई हो जाता, कंगन के वजन से,
आ जाती मोच पैर में, पायल के वजन से॥
 
माथा दुखने लगता है, बिंदी के भार से,
कंधे लचक जाते हैं, कुर्ती के भार से,
गर्दन है लोच खाती, बालों के भार से,
सीना पसीना हो जाता, फूलों के हार से॥
 
हालात इस तरह के, हर बात से डरें,
हालत है मेरी ऐसी, कैसे ब्याँ करें,
महबूब इतनी नाजुक, कैसे क्या करें।
आता नहीं समझ में, ऐसे में क्या करें॥ 
रणवीर सिंह (अनुपम)
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28 हमारे पास आकर के

हमारे पास आकर के, करो बातें न यूँ खाली। 
अगर खाली ही करना है, करो गमगीन दिल खाली।। 

बड़ी मुश्किल से मिल पाए, चलो कुछ  देर अब बैठें,
हमें भी आज फुर्सत है, लगो तुम भी हमें खाली।। 

तजुर्बेदार हम भी हैं, जहाँ हमने भी देखा है।
अरे कुछ काम भी करिये, बजाओ गाल मत खाली।।

फिकर दुनियाँ की कर-करके, हुए दिल खोखले अपने,
अजी ये छोड़िए दुनियाँ, न हम खाली, न तुम खाली।। 

मुकद्दर ये नहीं है तो, अजी फिर और क्या है ये,
कोई महलों में जन्मा है, किसी को माँ मिली खाली।। 

दिलों की बात सुनने की, जिन्हें फुर्सत न मिल पाई,
समय के देखिये करतब, वही बैठे हैं अब खाली।। 

हमारे यार की महफ़िल में, सब खुशहाल दिखते थे,
अगर कोई जला है तो, जले महफ़िल में हम खाली।। 

लगाकर सीने से बोतल, शराबी एक यों बोला,
अभी तूँ थी भरी-पूरी, अभी तूँ हो गई खाली।। 

शरीफों के मोहल्ले में, उसी पर हो रही चर्चा,
किसी भूखे भिखारी ने, जो रोटी छीनकर खा ली।। 

जिधर भी देखिये, हर ओर खाने में लगी दुनियाँ,
मगर कुछ हमसे हैं जिनने, न खाने की, कसम खाली।। 

नदी, पर्वत, खदानों को, न जाने खा गए क्या-क्या,
वो कुछ भी खा-पचा सकते, जो हैं ईमान से खाली।। 

हमारे पास जो भी है, चलो मिल-बाँटकर खा ले,
तुम्हारा पेट भी खाली, हमारा पेट भी खाली।। 

नशीयत दे रहा तुमको, सुनो अह रहनुमा मेरे, 
बहुत दिन तक गरीबों का, न रखिए पेट यों खाली।। 

उदर की आग के आगे, किसी की एक न चलती,
गिराकर तख़्त से तुमको, करा दे तख़्त न खाली।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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27 ठोंककर छाती कहो

प्रेम जो करते हो मुझसे, ठोंककर छाती कहो।
बात ये दुनियाँ तो जाने, ठोंककर छाती कहो।।
 
चाहते जो आप मुझसे, प्यार के इस खेल में,
माँग लो आकर के घर पे, ठोंककर छाती कहो।।
 
मनचला दिल गर गधी पर, आ गया तो सोच लो,
फिर निभा पाओगे रिश्ते, ठोंककर छाती कहो।।
 
और ये गर फट गया तो, घर तेरा बिक जायेगा,
क्या उठा पाओगे खर्चा, ठोंककर छाती कहो।।

देने को दे दूं तुझे मैं, चाहते जो यार तुम,
क्या सँभाले रख सकोगे, ठोंककर छाती कहो।।
 
राह काँटों से भरी है, हैं बहुत दुश्वारियां,
साथ मेरे चल सको तो, ठोंककर छाती कहो।।
 
बात मरने की नहीं मैं, जिंदगी की कर रहा
जी सको हर हाल में तो, ठोंककर छाती कहो।।
 
आ गया हूँ आज बिकने, अह खरीदारो सुनो,
मोल दे पाओ अगर तो, ठोंककर छाती कहो।।
 
किसमें ये सामर्थ्य है जो, सूर्य को रोशन करे,
है अगर औकात तो फिर, ठोंककर छाती कहो।।
 
अह पडोसी सब्र का मत, तुम मेरा इम्तहान लो,
युद्ध ही जो चाहते तो, ठोंककर छाती कहो।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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26. याद बाबा साहब का पैगाम करें


रोज बाबा साहब का हम ध्यान करें, मिल के रहें,
और  हर  इंसान  से  पहिचान  करें, मिल के रहें।
 
पतित, दलितों के  लिए,  बेखौप जो  लड़ता रहा,
क्यों उस  बलबान का, सम्मान करें, मिल के रहें।
 
जो अकेला  लिख  गया है, देश के  संविधान को,
क्यों न ऐसे शख्स पर अभिमान करें, मिल के रहें। 
 
जिसने नर और नारियों को, हक़ दिया है एक सा,
क्यों न उस विद्वान का गुणगान करें, मिल के रहें।
 
'ज्ञान का प्रतीक'  जिसको  विश्व  सारा  कह  रहा,
क्यों न गर्वित हिन्द हो, जयगान करें, मिल के रहें।
 
साथियो लख  दुर्दशा  को, चल  रहे  षड्यंत्र  को,
आने वाले  वक्त  का भी  भान  करें, मिल के रहें।

सोचिये, उठिये, समझिये, आज  के  इस  दौर में,
किस  तरह  आगे बढ़ें, उत्थान करें, मिल के रहें।

योग्यता  दासी  नहीं  हैं, जाति  की और  धर्म की,
हम सभी इस सोच को बलवान करें, मिल के रहें।

किस तरह  यह  हिंद, सारे  विश्व  का  शिरमौर हो,
आज से  जनजागरण, अभियान करें मिल के रहें।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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25 वर्तनी भी सीख जो पाये नहीं

एक मुक्तक आज के तथाकथित महाकवियों के नाम।

वर्तनी  भी  सीख  जो  पाए  नहीं, व्याकरण  को   आज  वो  गढ़ने  लगे।
क, ख, ग, जिनको अभी है  सीखना, एम. ए. की वो  पुस्तकें  पढ़ने लगे।
वज्न,  बहरों  का  पता  जिनको  नहीं, आज  वो  ही  शायरी करने  लगे।
शब्दों का मतलब जिन्हें मालूम ना, गीतिका, कविता, गजल लिखने लगे।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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24 नाक में नथनी कर में कंगन (आल्हा छंद)

वीर छंद/आल्हा (16/15, अंत में 21)

एक तो उमर अठारह की है,  
दूजे रूप दिया करतार।
तीजे है भरपूर जवानी, 
चौथे सजधज हुई तियार।

शीशफूल जूड़े में साजे, 
और गले बिच मोतिन हार।
नाक नथनियाँ, कानन बाली, 
गजरा मँहके खशबूदार।।

भाल मध्य बिंदी शोभित है, 
दुगना माथा रही निखार।
रंग बदामी है गालों पर, 
मुख पर लिए लाज का भार।

सुर्ख गुलाबी होंठ लगे यों, 
ज्यों खिलने को कली तियार।
नख-शिख सजी कामिनी लागे, 
जैसे कोई चढ़ा सितार।।

माहवर साजे दोऊ पैरन, 
टिकुली चंदा के उनहार।
आठ मुद्रिकायें उँगलिन में, 
कोनी तक चूड़िन का भार।

पतली कमर लेय हिचकोले, 
जैसे लचक रही हो डार।
पंकज पैर धरति धरनी पर, 
रुक-रुक चलत कामिनी नार।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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वीर छंद/आल्हा
31मात्रा (16/15), अंत गुरु लघु (21) अनिवार्य

नाक नथनियाँ, कर में कंगन, 
कोनी तक चूड़िन का भार।
नयन झुके हैं, पलकें भारी, 
अरु अँखियों पर चढ़ा खुमार।।

गाल गुलाबों सम लगते हैं, 
मुखड़ा चंदा के उनहार।
सुर्ख गुलाबी ओंठ लगें ज्यों, 
हो खिलने को कली तियार।।

मेंदी साज रही हाथों में, 
और गले बिच मोतिन हार।
इतना सारा बोझ सहन को,
ग्रीवा करती है इनकार।।

रूप, जवानी अरु आभूषण, 
ऊपर से सोलह श्रृंगार।
यों सज-धजकर बैठी गोरी, 
मोहित करने को संसार।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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23 जीवन में बाँध लाती हैं

जीवन में जब भी आतीं, बनकर के हीर ये।
आँचल में बाँध लातीं हैं, शीतल समीर ये॥
 
चुपचाप हर दुःख दर्द को, खुद में समेट लें,
सब कुछ खुशी से सह ले, नाजुक शरीर ये॥
 
मौका पड़े तो ये किसी पे' चूकतीं नहीं,
छाती के भीतर जा घुसें, ऐसा हैं तीर ये॥

ये हिन्द की हैं नारियाँ, सचमुच की शेरनी,
गेहूँ के माफिक देह में, कर दें लकीर ये॥
 
सौहर पे आँच आये, फिर देखिये इन्हें,
यमराज भी हो सामने, डालेंगी चीर ये॥
 
कामुक नजर से देख मत, पत्नी पराइ को,
ये जहर है, तू मत समझ, खाने की खीर ये॥

मैं तो कहूँगा चार के चक्कर में तू न पड़,
एक ही बना के छोड़ेगी, तुझको फकीर ये॥
 
इनके मुकाबिले में, दुनियाँ में कौन है?
अनुपम हैं, बेमिसाल हैं, हैं बेनजीर ये..
रणवीर सिंह (अनुपम)
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22 अब तमन्ना नहीं है मुझे हार की

अब तमन्ना नहीं है मुझे हार की,
ना ही है आरजू दिल में बाज़ार की,
मंदिरों की भी चाहत न यूं तो मुझे,
ना हसीनों के बालों में गूँथो मुझे॥
 
उन स्वागत द्वारों पे मत टांगना,
भ्रष्ट नेता जहां से गुजरते फिरें,
ऐसी गर्दन की भी चाह मुझको नहीं,
देश हित में जो कटने को तन न सके॥
 
जो कि तूफान थे, देश की शान थे,
ना ख़्वाहिश थी जिनको कफन के लिए,
तोड़कर फेंकना उस समाधी पे बस,
हँस के जो मिट गये हैं वतन के लिये॥ 
रणवीर सिंह (अनुपम)
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387. मत हसीनों के बालों में   

मत  हसीनों  के   बालों  में   गूँथो  मुझे।
अब  तमन्ना   नहीं   है   मुझे   हार  की।
मंदिरों  की  भी  चाहत   न  यूं  तो मुझे।
ना ही  है  आरजू  दिल  में  बाज़ार  की।

ऐसे  द्वारों  पे  जाकर  के  मत  टाँगना।
जिनसे  भ्रष्टों  की  रैली  गुजरती  फिरे।
ऐसी गर्दन  की  भी  चाह  मुझको नहीं।
देशहित  में  जो  कटने  से  डरती फिरे।

जो  कि  तूफान  थे, देश  की  शान  थे।
थी ख़्वाहिश न जिनको कफन के लिए।
तोड़कर  फेंकना उस  समाधी  पे  बस।
हँस के  जो मिट गये  हैं वतन  के लिए।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
29.07.2017
*****
 

21 "इस तरह देखा न कर"

तरह देखा न कर

सच कहूँ तो मुस्कराकर, इस तरह देखा न कर,
अपनी' ये नजरें झुकाकर, इस तरह देखा न कर।।

देखना जो चाहती है, देख ले बस दूर से,
आँख से आँखें मिलाकर, इस तरह देखा न कर।।

कानाफूसी' चल रही है, हर गली में आजकल, 
मजनुओं का दिल जलाकर, इस तरह देखा न कर।।

आपके घर के बगल में, मनचले भी लोग हैं,
हर किसी से दिल लगाकर, इस तरह देखा न कर।।

है नहीं तुझको पता, कि लोग कितना चाहते,
मर मिटेंगे लड़-लड़ाकर, इस तरह देखा न कर।।

इस तबस्सुम इस हँसी पर, जान जाती है निकल,
दाँत से उँगली दबाकर, इस तरह देखा न कर।।

आग पानी में लगा, देगा तुम्हारा  तन-वदन,
झील के जल में समाकर, इस तरह देखा न कर।।

जाग जायेगी तमन्ना, इन बुतों में एक दिन,
तू इन्हें नज़दीक जाकर, इस तरह देखा न कर।।

कौन क्षण नीयत बदल ले, रूप तेरा देखकर,
आइने को पास लाकर, इस तरह देखा न कर।।

कल जिसे देखा था' तूने, हो गया वो बावला,
हसरतें दिल में जगाकर, इस तरह देखा न कर।।

कातिलाना ये नज़र, पत्थर के दिल को चीर दे,
इस तरह नजदीक आकर, इस तरह देखा न कर।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
*****


पुरानी 

मापनी-2122    2122    2122   212

सच कहूँ तो मुस्कराकर, इस तरह देखा न कर,
अपनी' ये नज़रें झुकाकर, इस तरह देखा न कर।।

देखना जो चाहती है, देख ले बस दूर से,
किन्तु आँखों में समाकर, इस तरह देखा न कर।।

कानाफूसी' चल रही है, हर गली में आजकल, 
दाँत से उँगली दबाकर, इस तरह देखा न कर।।

कौन क्षण नीयत बदल दे, रूप तेरा देखकर,
आइने को  सज-सँवरकर, इस तरह देखा न कर।।

आग पानी में लगा, देगा छरहरा तन-वदन,
झील के भीतर उतरकर, इस तरह देखा न कर।।

तेरे घर के भी बगल में, मनचले कुछ लोग हैं,
मशवरा है, हर किसी को, इस तरह देखा न कर।।

है नहीं तुझको पता, कि लोग कितना चाहते,
लड़-मरेंगे एक दिन ये, इस तरह देखा न कर।।

कल जिसे देखा था' तूने, हो गया वो बावला,
प्यार के मारे हुओं को, इस तरह देखा न कर।।

कातिलाना ये नज़र, पत्थर के दिल को चीर दे,
मेरा' तो नाजुक जिगर है, इस तरह देखा न कर।।

रणवीर सिंह (अनुपम)

20 "अभी तक होश न आया"

अभी मुख भी नहीं देखा, फ़कत पैरों को देखा है,
पड़ा तब से है चरणों में, अभी तक होश न आया।।
 
अभी क़दमों की चालों के, सिवा उसने न कुछ देखा,
तभी से लड़खड़ाता है, अभी तक होश न आया।।
 
फ़कत आँखों से' पीकर के, हुआ मदहोश इस तरह,
कहीं प्याला, कहीं है वो, अभी तक होश न आया।।
 
किसी ने चुपके से जाकर, उसे बिस्तर पे देखा था,
पकड़ कर रह गया बिस्तर, अभी तक होश न आया।।
 
बनाकर उसका बुत उसने, नज़र भर जिस घड़ी देखा,
तभी से बुत बना बैठा, अभी तक होश न आया।।
 
गयी वो ताज देखन को, मगर जब ताज ने देखा,
खड़ा खामोश है तब से, अभी तक होश न आया।।
 
बड़े मगरूर रहते थे, जो अपने हुश्न के ऊपर,
हमारे यार को देखा, अभी तक होश न आया।।
 
कयामत हुश्न है उसका, जो देखे वो बहक जाये,
उसे जिसने भी देखा है, उसी को होश न आया।।
 
बिना परदे के गर देखूँ, न जाने फिर क्या होगा,
फकत परदे में देखा था, अभी तक होश न आया।।
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19 "ये तमाशा किसलिए"

मापनी-2122  2122    2122  212

आये' दिन ये दिन मनाने, का तमाशा किसलिए।
आधुनिक बनने-बनाने, का तमाशा किसलिए।।

इस तरह दिवसों के' भीतर, जिंदगी को ढूँढना,
रोज नासमझी दिखाने, का तमाशा किसलिए।।
 
आज माँ कल बीबियों का, बाप का परसों का' दिन
रिश्तों' की खिल्ली उड़ाने, का तमाशा किसलिए।।

चॉकलेटों के भी' दिन मनने लगे हैं आजकल,
बेबकूफी आजमानेे, का तमाशा किसकिए।।

प्यार का भी एक दिन, निश्चित किया है आपने,
जिस्म को यूँ लूट खाने, का तमाशा किसलिए।।
 
जिसके' ही अस्तित्व में, इस सृष्टि  का अस्तित्व है,
ऐसी' माँ का कद घटाने, का तमाशा किसलिए।।
 
कार्ड दे दो और कर दो, इतिश्री कर्त्तव्य की, 
इस तरह रिश्ते निभाने, का तमाशा किसलिए।।
 
रणवीर सिंह (अनुपम)
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18 सिंहनी हो आचरण फिर

सिंहनी हो, आचरण फिर, सिंहनी  जैसा करो।
हंसनी होकर  के'  कागों, संग  मत  घूमा करो।
आपकी यह आबरू है, जान  से  प्यारी  मगर।
झाड़ियों में स्यार के सँग, मत  उठा-बैठा करो॥ 

 रणवीर सिंह (अनुपम)
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17 हमारे पास आकर के

हमारे पास आकर के, मेरे पहलू में तुम बैठो,
वहाँ पर क्यों खड़ी ऐसे, यहाँ आकर के तुम बैठो।।
 
अजी मैंने भी दुनियाँ को, बड़े भीतर से देखा है,
जहाँ सब बैठना चाहें, वहाँ जाकर न तुम बैठो।।
 
छुपाना लाख तुम चाहो, मगर ये प्यार
कब छुपता?
दर-ओ-दीवार भी पतले, न इनके पास तुम बैठो।।
 
बनाकर झील को दर्पण, न खुद को इस तरह देखो,
किनारे टूट जायेंगे, किनारों पर न तुम बैठो।।
 
गुलाबों सा खिला चेहरा, अगर जो देख लें तारे,
जमीं पर आ गिरेंगे सब, खुली छत पर न तुम बैठो।।
 
हमारा फ़र्ज़ चेताना, तू माने या नहीं माने,
तुम्हारा दिल जहाँ चाहे, वहाँ जाकर के तुम बैठो।।
 
तमन्ना, आरजू, ख्वाहिश, सभी कुछ छोड़ दूँगा मैं,
सँवरकर, एक दिन आकर, मेरे सम्मुख जो तुम बैठो।।
*****

16 अगर मिलना ही है तुझको

अगर मिलना ही है मुझसे, तो दुनियां को बताकर मिल।
मजा तब ही है मिलने में, सभी को यह जताकर मिल।।
 
मुलाकातें ही जो करनी, मिलें हम झाड़ियों में क्यों?
बुला ले अपने घर पर या, हमारे घर पे आकर मिल।।
 
बताकर सारी सच्चाई, तू अपने घर पे, आया कर,
तुझे हर रोज समझाता, बहाने मत बनाकर मिल।।
 
तुझे जिस रोज से देखा, मोहल्ला हो गया पागल,
कहीं बलवा न हो जाये, वहाँ मत रोज जाकर मिल।।
 
कई हफ़्तों से लोगों में, हमारी हो रही चर्चा,
नसीहत है मेरी तुझको, तू सबसे बच-बचाकर मिल।।

जो गाती है, तो गा ऐसे, जमाना झूम जाये ये,
तू अपने सुर्ख अधरों से, मिलन के गीत गाकर मिल।।
 
गुलाबों सा तेरा चेहरा, नयन हिरनी से ये तेरे,
सुराही सी तेरी गर्दन, इन्हें यूँ मत झुकाकर मिल।।
 
हमारे घर में आने में, लगा दीं तूने तो सदियाँ,
अगर अब आ गई ही है, तो नज़रों को मिलाकर मिल।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
*****

15 सभी मदमस्त बौराये हुए वाचाल

सभी मदमस्त, बौराये, हुए वाचाल होली में,
रंगा है ब्रज, रंगी मथुरा, रंगा भोपाल होली में।।
 
अनोखा पर्व है होली, अनोखी मस्तियाँ इसकी,
कुलाँचे भर रहे बुड्ढे, बदल गई चाल होली में।।
 
चढ़ी है भांग इस तरह, कोई हँसता, कोई रोये,
गजब के कर रहे करतब, अजब है हाल होली में।।
 
कोई तस्वीर को चूमें, कोई चूमें दुपट्टे को,
कोई है चूमता फिरता, लिए रूमाल होली में।।
 
लगाकर कुल्लिया 'घीसू' में, आया हौंसला इतना,
जरा सी बात पर 'गामा' से, ठोंके ताल होली में।।
 
तेरा प्रेमी दिखे है जो, वो कल तक दूसरे का था,
तू काहे पालती इस जान का, जंजाल होली में।।
 
सँभल जा होश में आजा, तेरा उपभोग करके ये,
ये अगले साल ढूँढेगा, नया फिर माल होली में।।
 
उलझ मत सालियों से तू, ये ऐसा हाल कर देंगी,
तू जाना छोड़ देगा फिर, अरे ससुराल होली में।।
 
पड़ी बौछार गोरी के, गुलाबी गाल के ऊपर,
लिया है रोक घूँघट से, बनाकर ढाल होली में।।
 
बहाना मिल गया उसको, तो कितना गिर गया देखो,
रंगों के नाम पर गोरी के, नोंचे गाल होली में।।
 
जहाँ उसका किया है दिल, उसी स्थान को है रगड़ा,
न छोड़ी एक भी जगह, किया न ख्याल होली में।।
 
कोई काली, कोई पीली, कोई नीली बना डाली,
किसी श्यामल सलौनी को, किया है लाल होली में।।
 
वो रंग से तर-बतर होकर, सिमटकर देह में अपनी,
लगे खजुराहो की मूरत, हुई बेहाल होली में।।
 
ये फागुन किस तरह उनमें, नशीला जोश भर सकता,
जिन्हें रोटी नहीँ सूखी, जिन्हें न दाल होली में।।
 
मनाएं किस तरह होली, अरे  इस देश में 'अनुपम',
जहाँ भूखे, जहाँ नंगे, फिरें कंगाल होली में।।
 
अगर जल्दी न सुलझा ये, गरीबी, भूख का मसला,
उठेगा जलजला हर ओर, और भूचाल होली में।।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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14 मेरे दिल की उलझन तुम्हारी ये जुल्फें

मेरे दिल की उलझन, तुम्हारी ये ज़ुल्फें,
करे रूप की, पहरेदारी ये ज़ुल्फें॥
 
लटकती लटें इनकी जादू बिखेरें,
बड़े ही हुनर से, सँवारी ये ज़ुल्फें॥
 
कभी बनके बदली, छुपा लेती चेहरा,
कभी चूमती मुख, प्यारी ये ज़ुल्फें॥
 
लिपट जाती गर्दन से, चंदन समझकर,
नागिन सी लगती, तुम्हारी ये ज़ुल्फें॥
 
हँस-हँस के फंदे में, आता फंसाना,
बड़ी बहुत शातिर, शिकारी ये ज़ुल्फें॥
 
कयामत ये ढाती जिगर पे हमारे,
लगें देखने में, बेचारी ये ज़ुल्फें॥
 
करें घाव ऐसा, नज़र भी न आए,
आरी है या फिर कटारी, ये ज़ुल्फें॥
 
कभी नींद छीनें, कभी चैन छीनें,
कभी दे बड़ा, बेकरारी ये ज़ुल्फें॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
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13 इक बुत को लगा के गले

इक बुत को लगा के गले, मैंने ने महसूस किया,
पत्थर के भीतर भी, इक चाह मचलती है॥
 
विधवा रातों की तड़फ, कोई कैसे जान सके,
हर शाम से सुबह तलक, करवट जो बदलती है॥
 
पुरुषों की काम अगिन, हर रोज बुझाती जो,
वो ही भीतर से क्यों, अंगार सी जलती है॥
 
हर गम को छुपा दिल में, औरत मुस्काती जो,
उसके अंर्तमन में, आरी सी चलती है॥
 
औरत का निकलना घर से, अब भी आसान नहीं,
नारी हर रोज नए, काँटों से गुजरती है॥
 
गलियों में, दपत्तर में, हर जगह गिध्द बैठे,
फिर भी हिम्मत से ये, आगे को बढ़ती है॥
 
नारी जीवन दाता, नारी सुखदायी है,
पुरुषों के जीवन में, निर्झर सी झरती है॥
 
फिर भी न जाने क्यों? सिर शर्म से झुक जाता,
नारी जब अधनंगी, पर्दे पे दिखती है॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
       *****

12 ज़िन्दगी महलों में जीना

ज़िंदगी महलों में जीना, ही नहीं है जिंदगी,
इस जमीं से आसमां तक, हर जगह है जिंदगी।।
 
आदमी जब आदमी से, प्यार ही न कर सके,
क्या सिखाया धर्म ने फिर, क्या सिखी है जिंदगी।।
 
गर पड़ोसी की जरूरत, में न आऊँ काम तो,
काहे का इंसान मैं हूँ, काहे की है ज़िन्दगी।।
 
अपने साथी से वफ़ादारी निभाता जो नहीं,
वासना, दुर्गन्ध, कीचड़, सी लगे वो जिंदगी।।
 
तू समझता नारियाँ इक, भोगने की चीज हैं,
जानवर सी सोच तेरी, जानवर सी जिंदगी।।
 
लब्ज और करतूत में, कोसों का जिनके फासला,
इनसे रहना तू सँभलकर,  दोमुँही है जिंदगी।।
 
जो बुढ़ापे में सहारा, ना बने माँ-बाप का,
काहे की औलाद वो है, काहे की है जिंदगी।।
 
कौन सा घुन लग गया है, आज के आवाम में,
जिंदगी से आज बच-बच, चल रही है जिंदगी।।
 
बात मजलूमों, गरीबों, की अगर मैं ना करूँ,
काहे का मैं रहनुमा फिर, काहे की ये जिंदगी।।
 
सादगी के संग जीना, बात है आसां नहीं,
जब चलो तो मुश्किलों से, है भरी ये जिंदगी।।
 
जो जिऊँ खुद के ही लिए, निज पेट भरने के लिए,
सच कहूँ ये ज़िंदगी, 'अनुपम' नहीं है ज़िंदगी।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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11 दिन में बाहर मत कढ़ आली

दिन में मत बाहर कढ़ आली, तेरा रूप निरख रवि रुक नहिं जाए,
सखि रात को मत छत पर निकरो, शशि देख तुझे कहीं छुप नहिं जाए,
तेरे तन से गंध चुरावन हित, कहीं तुझसे समीर लिपट नहिं जाए,
जो भूल गई निज कर्म पवन, जा तन से स्वाँस निकल नहिं जाए।।
 
रवि, चाँद, समीर जो पथ भटकें, जगवासिन मारग कौन दिखाए,
सखि तेरो तो कछु न जाइहै, जिनको जाइहै, उन्ह को समझाए,
फिर कौन संभाले जा धरनी, जब जाकिह चाल बिगड़ जाए,
यही हाल रहा दो-चार दिना, तेरी दृष्टि से सृष्टि को कौन बचाए।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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10 मनचलों को देखकर तू

गीतिका छंद-2122  2122  2122  212

मनचलों को देखकर तू, मुस्कराना छोड़ दे।
ऐरे-गैरे हर किसी से, दिल लगाना छोड़ दे।।
 
कुछ नहीं तुझको मिलेगा, फक्कड़ों की प्रीत से,
हर किसी से राह में, आँखे लड़ाना छोड़ दे।।
 
तन ते'रा अँगड़ाइयाँ, लेने लगा है आजकल,
अब तो' बच्चों की तरह, लड़ना-लड़ाना छोड़ दे।।
 
हो गई अठरा वर्ष की, यों उठा-बैठा न कर,
है तकाजा उम्र का, मिलना-मिलाना छोड़ दे।।
 
इस तवस्सुम, इस हँसी पर, जान जाती है निकल,
इस तरह हर बात पर, तू खिलखिलाना छोड़ दे।।
 
देखकर रंग-रूप तेरा, है पड़ोसन जल रही,
सज-सँवरकर और उसको, तू जलाना छोड़ दे।।
 
तू जिसे चाहे उसे फिर, फिक्र है किस बात की,
क्या मुहल्ला, क्या गली, वो तो जमाना छोड़ दे।।
 
बावले होकर के कितने, मिट गए इस हुश्न पर,
इस तरह इन आशिको को, तू मिटाना छोड़ दे।।
 
आ गए अपनी गली में, घर भी ज्यादा दूर ना,
चल सँभलकर यार अब तू, लड़खड़ाना छोड़ दे।।
 
तू मिली जब से मुझे, दुश्मन हजारों बन गए,
नित नए इस जान के, दुश्मन बनाना छोड़ दे।।
 
आज तक समझा नहीं कि, चाहती है तू क्या,
छोटी'-छोटी बात पर तू, आजमाना छोड़ दे।।
 
तेरी' वाचाली से रातों, में खखल पड़ने लगा,
कम से कम तू नींद में तो, बड़बड़ाना छोड़ दे।।
 
महफ़िलों में आपके जो, आज तक जलता रहा,
दिलजले आशिक का अब तू, दिल जलाना छोड़ दे।।
 
क्या मिला 'अनुपम' तुझे, साकी से नाता जोड़कर,
वक्त है अब भी अरे, पीना-पिलाना छोड़ दे।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
                    *****

9 मेरे दिल की धड़कन तुम्हारी ये आँखें

मे'रे दिल की'धड़कन, तुम्हारी ये आँखें, 
मुझे लग रहीं जां, से' प्यारी ये आँखें॥
 
समुंदर की गहराई, को हैं समेटे, 
किसी की हैं विरहा की, मारी ये आँखें॥
 
गयी रात फिर भी, खुमारी है बाकी,
ये बोझिल सी पलकें, क्वारी ये आँखें॥
 
मेरा चित्त, चितवन, चुरा ले गयीं हैं, 
हुयी पार दिल के, कटारी ये आँखें॥
 
जिन्हें इक नज़र, देखना चाहे दुनिया,
लबालब हैं मधु से, न्यारी ये आँखें॥
 
उठता गया ज्यों ये, चेहरे से घूँघट, 
झुकती गई त्यों, तुम्हारी ये आँखें॥
 
खुली आँखों में वो, नज़ारा है देखा, 
खुली रह गयी फिर, हमारी ये आँखें॥

रणवीर सिंह (अनुपम)
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8 कितने सवाल कर रहीं

2212  1212 /  22  1212  (13/10)

कितने  सवाल कर रहीं, आँखें  बड़ी-बड़ी,
क्या-क्या कमाल कर रहीं, आँखें बड़ी-बड़ी।।

जब  से  मुझे निगाह  भर, देखा हुज़ूर  ने,  
तब से बे'हाल  कर  रहीं, आँखें बड़ी-बड़ी।।

दिल में घुसी कटार सी, दिनरात चुभ रहीं
हँस-हँस हलाल कर रहीं, आँखें  बड़ी-बड़ी।।

आईं  हैं' तब से है लगा, मजमा पड़ोस में,
कितना बवाल कर रहीं, आँखें बड़ी-बड़ी।।

मुर्दे भी' उठ के' कर उठें, जीने की' कामना,
सब को निहाल कर रहीं, आँखें बड़ी-बड़ी।।

वीरानगी में आगमन,  से  फूल  खिल  उठे,
जीवन बहाल  कर  रहीं, आँखें  बड़ी-बड़ी।।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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7 प्रेम के दो शब्द पढ़कर

प्रेम को पढ़कर के लोगो, मैं कहाँ काबिल हुआ।
व्यर्थ ही मैं प्रेम के, स्कूल में दाखिल हुआ॥
 
तब से तेरा हुश्न ये, ज्यादा लगे निखरा मुझे,
जब से तेरी जिंदगी में, यार मैं शामिल हुआ॥
 
जब शराफत से रहा, तो भटकता था दर-बदर,
कामियाबी मिल रही है, जब से वो जाहिल हुआ॥
 
धार था तो रौब था, रुतबा था, सबको खौफ था,
गंदगी से भर गया हूँ, जब से मैं साहिल हुआ॥
 
नासमझ, कमअक्ल, ढोंगी, ये मिले तमगे मुझे,
सादगी की ज़िन्दगी में, सिर्फ ये हासिल हुआ॥
रणवीर सिंह (अनुपम)
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6 इस हकीकत पर लिखो

गीतिका छंद - 2122   2122  2122  212

इस हकीक़त पर लिखो या, उस फ़साने पर लिखो,
आज पर भी तुम लिखो गुजरे ज़माने पर लिखो,
घाव देने का चलन, हर ओर अब है चल रहा,
जब भी लिक्खो यार अब, मलहम लगाने पर लिखो।।
 
नफरतों पर मत लिखो, मत दिल दुखाने पर लिखो,
दर्द में डूबे हुए सारे ज़माने पर लिखो,
हादसों पर हादसे हर ओर अब तो हो रहे,
आदमी के दर्द और उसके कराहने पर लिखो।।
 
भोले'-भाले इन किसानों की जमीनों पर लिखो,
हड़पने को ताक में, इन नामचीनों पर लिखो,
हिन्द में रहकर के रखते, हिन्द से जो दुश्मनी,
साँप  जो  पाले हुए, उन आस्तीनों पर लिखो।।
 
है गरीबी चीज क्या, इसको बताने पर लिखो,
देश से इस भुखमरी को, अब मिटाने पर लिखो,
बात करिए खेत की, खलिहान की अरु भूख की,
आदमी के अब उजड़ते, आशियाने पर लिखो।।
 
बाग़ पर लिखते हो तो, मौसम सुहाने पर लिखो,
पक्षियों के कोलाहल और चेंचिहाने पर लिखो,
जिंदगी अनमोल है आशा, उमंगों से भरी,
उड़ने को चूजों के पर के, फड़फड़ाने पर लिखो।।
 
दिल्लगी पर मत लिखो अब दिल लगाने पर लिखो,
फूल पर लिखते हो तो, भँवरे दिवाने पर लिखो,
रूप और सृंगार पर, सब कुछ तो तुमने लिख दिया,
प्रेयसी की वाट और प्रीतम के आने पर लिखो।।
 
साथियो आओ बढ़ो, गम भूल जाने पर लिखो,
नारियों और बेटियों को अब बचाने पर लिखो,
कंक्रीटों के यहाँ जंगल खड़े चहुँओर हैं,
इस धरा को पेड़-पौधों से सजाने पर लिखो।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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5 मेघ भरी काली रातों में (गीत)

मेघ भरी काली रातों में, अनजाना सा पहरा होता।
गगन ताकते इन नयनों में, अक्सर ख्वाब सुनहरा होता।।

आँखें मूँद, भूलना चाहूँ,  फिर क्यों नींद नहीं आती,
करवट बदल-बदलकर यों ही, रोज रात है कट जाती,
विरह वेदना से बेकल ये, अंतर तपता सेहरा होता।।

ग़ज़ल लिखूँ या कोई कविता, उसकी छवि को पाता हूँ,
लिखना चाहूँ विरह गीत पर, प्रेम गीत लिख जाता हूँ,
क्योंकि इन आँखों में उसका, खिला गुलाबी चेहरा होता।।

ख्वाबों के उपवन में आकर, कलिका बन खिल जाती है,
जब ये स्वप्न सुंदरी मुझको, सपनों में मिल जाती है,
रात दीवाली हो जाती है, अगला दिवस दशहरा होता।।

क्यों मीरा को विष मिलता है, मजनूँ को पत्थर मिलते,
शीरी और फरहाद सदा क्यों, विरह वेदना में जलते,
प्रेम मार्ग क्यों इतना दुष्कर, क्यों जग गूंगा-बहरा होता।।

मर्म भरी अनुराग की बातेँ, अनुरागी ही जान सके,
मुल्ला-पंडित धर्म के ज्ञाता, इसको कब पहिचान सके,
प्रेम में सब कुछ सह जाता जो, वो सागर से गहरा होता।।
रणवीर सिंह (अनुपम)
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4 इस तरह से मत चलो

हो गयी अठरा बरस की, इस तरह से मत चलो।
दौर ये फिसलन भरा है, इस तरह से मत चलो।।
 
आग के दरिया में मत घुस, सोच ले अंजाम को,
आग आखिर आग होती, इस तरह से मत चलो।।
 
मत उलझ भंवरों से ऐसे, तू अभी कच्ची कली,
बात मानो इस उमर में, इस तरह से मत चलो।।
 
फूल सी निखरी हुई, इस देह पर काबू रखो,
इसको बेकाबू बनाकर, इस तरह से मत चलो।।
 
ये तेरी अल्हड़ जवानी, ले रही अंगड़ाइयाँ, 
राह में अंगड़ाइयाँ ले, इस तरह से मत चलो।।

ठीक है फागुन महीने, का नशा तुझ पर चढ़ा,
पर नशे में लड़खड़ाकर, इस तरह से मत चलो।।

अनछुए यौवन पे तेरे, है नज़र सबकी गढ़ी,
तंग गलियों से गुजरकर, इस तरह से मत चलो।।

दूधिया तन ले प्रिये मत, झील के भीतर घुसो,
आग दरिया में लगाने, इस तरह से मत चलो।।

जब जमीं पर तू चले तो, साँस थम जाती मेरी,
अह! मेरी गजगामिनी तुम, इस तरह से मत चलो।।

उर्वशी, रंभा, अरे ओ ! मेनका, ओ ! मोहनी,
तुम मुझे पथ-भ्रष्ट करने, इस तरह से मत चलो।।

इस तरह यों सज-सँवरकर, काम की देवी रती, 
प्राण हरने मुझ पुरुष के, इस तरह से मत चलो।।
 
रणवीर सिंह (अनुपम)
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3 उन आँखों का यारो क्या कहना


जिन आँखों से आँखें चार हुई, उन आँखों का यारो क्या कहना।
जिनमें डूबे फिर उबरे, उन आँखों का यारो क्या कहना।।
 
धरती सा धैर्य दिखे जिनमें, जो अम्बर सा विस्तार लिए,
सागर को समेटे जो खुद में, उन आँखों का यारो क्या कहना।।
 
निश-दिन जो पथ पर बिछकर के, साजन की राह निहार रहीं,
बिरहा के बोझ से बोझिल हैं, उन आँखों का यारो क्या कहना।।

जो वार कटारी सा करतीं, जो उर के भीतर जा धँसतीं,
जो चाक जिगर कर देतीं हैं, उन आँखों का यारो क्या कहना।।

जो चैन चुराकर हर दिल को, कंगाल करें, बेहाल करें,
मदहोश करें, बेहोश करें, उन आँखों का यारो क्या कहना।।
 
उन मद्य भरे दो प्यालों को, जिसने देखा मदमस्त हुआ,
जिन्हें देख के दुनियाँ बौराई, उन आँखों का यारो क्या कहना।।

ज्यों-ज्यों घूँघट ऊपर सरका, त्यों-त्यों धरनी की ओर झुकीं,
जो शर्मो-हया से उठ सकीं, उन आँखों का यारो क्या कहना।।
 
जिनमें हैं तमन्ना, आकर्षण, जीवन जीने का आमंत्रण,
जिनमें ब्रह्मांड समाया हैं, उन आँखों का यारो क्या कहना।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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