787. जो कल तक थे (मुक्तक)
जो कल तक थे चोर-उच्चक्के, दौलत भरें करोड़ों की।
देशभक्त अपमानित होते, जय-जय होय भगोड़ों की।
चहुँदिश मौज निकम्मे करते, मेहनतकश भूखे मरते।
गधे दुलत्ती मार रहे हैं, देह कुट रही घोड़ों की।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
03.07.2019
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