680. पंकज मुख रक्तिम अधर (कुंडलिया)
पंकज मुख रक्तिम अधर, गौरवर्ण यह देह।
श्याम चक्षु श्यामल लटें, नैनन छलके नेह।
नैनन छलके नेह, हिया ले रहा हिलोरें।
कामिन समझ न पाय, कौन विधि बाँधें-छोरें।
रसिक बावले फिरें, लूटने को अनुपम सुख।
सृष्टि दिखे बेचैन, देखकर यह पकंज मुख।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.01.2019
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