Thursday, October 22, 2015

129. दशमीं मनाने चले (कवित्त)

दशमीं मनाने चले, रावण जलाने चले,
किन्तु हमें राम यहाँ, एक भी न मिले है।

नारियों पे अत्याचार, बच्चियों को डाले मार,
जरा भी न काँपे मन, हृदय न छिले है।

धर्म के पुजारियों का, इन व्यभिचारियों का,
क्वारियों को भोग-भोग, बूढ़ा मन खिले है।

बीसों राधे घूम रहीं, गाल-मुख चूम रहीं,
करें लाख ओछे कृत्य, पदवी न हिले है।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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