Sunday, October 18, 2015

118. आली संग झूल रही (कवित्त)

मनहरण घनाक्षरी

आली संग  झूल रही, गोरी मन  फूल रही,
अमुआ की डाल देखो, लच-लच जात है।

सावन  की  घट  छाई,  तन लेत  अँगड़ाई,
दिल कहे  पिया-पिया, फूली न समात है।

सखि से कहे है गोरी, तू न जाने गति मोरी,
बस  में   बहन  नहीं,  मेरो आज  गात  है।

जल की फुहार आली, करे मोय मतवाली,
तन  में  हमारे  आज,  आग कूँ  लगात है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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आली-सखी; मोय-मुझे; गात-शरीर; कूँ-को

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