459. धारण कर धवल वस्त्र तन पर (मुक्तक)
धारण कर धवल वस्त्र तन पर, जो हरदम चलें गलीचों में।
वो ही जाने क्यों लुढ़क रहे, अब गोबर, कीचड़, कींचों में।
सीडी में उलझी राजनीत, गली-गलौज पर आ पहुँची।
हीनों से हीन आचरण है, कुछ बचा नहीं इन नीचों में।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.12.2017
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