Saturday, December 05, 2015

160. जा तन प्रेम न ऊपजे (कुण्डलिया)

जा  तन  प्रेम  न  ऊपजे, सो  तन  है  बेकार।
प्रेम बिना सब खोखला, मृदु वाणी, व्यवहार।
मृदु वाणी, व्यवहार, प्रेम बिन जन्में  किसमें?
वे  ही  रिश्ते  चलें,  प्रेम  हो  बसता  जिसमें।
प्रेम जगत का सार, शेष  सब आवन-जावन।
वो  तन हैं  पाषाण,  प्रेम  नहिं  भीतर  जा तन।
रणवीर सिंह (अनुपम)
*****

No comments:

Post a Comment

Note: Only a member of this blog may post a comment.