385. रवि चाँद समीर जो पथ भटकें
रवि, चाँद, समीर जो पथ भटकें, जगवासिन मारग कौन दिखावै।
तेरो तो कछु नहिं जाइहै सखि, जिनको जाइहै उन्हे को समझावै।
फिर कौन सँभाले जा धरनी, जब जाकिह चाल बिगड़ जावै।
यही हाल रहा दो-चार दिना, तेरी दृष्टि से सृष्टि को कौन बचावै।
रणवीर सिंह (अनुपम)
*****
No comments:
Post a Comment
Note: Only a member of this blog may post a comment.