Tuesday, August 22, 2017

401. चमेली कुमुदिनी बेला (मुक्तक)

401. चमेली कुमुदिनी बेला (मुक्तक)

चमेली  कुमुदिनी  बेला, खिली कचनार लगती हो।
करे तप भंग ऋषियों का, वो चंचल नार लगती हो।
विधाता  ने  तराशा  है, तुम्हारा जिस्म  फुरसत  में।
समूची  सृष्टि  का तुम ही, प्रिये आधार  लगती  हो।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
21.08.2017
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