742. गिद्धों की धरती यहाँ (कुंडलिया)
गिद्धों की धरती यहाँ, गिद्धों का आकाश।
फिर क्यों ये माँगें नहीं, हमसे ताजी लाश।
हमसे ताजी लाश, चाहिए हर दिन इनको।
हमरी ही है उपज, दोष भी दूँ तो किन को।
मारकाट, आतंक, इन्हें हसरत युद्धों की।
लाशों के हों ढेर, कामना है गिद्धों की।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.03.2019
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