Saturday, March 30, 2019

742. गिद्धों की धरती यहाँ (कुंडलिया)

742. गिद्धों की धरती यहाँ (कुंडलिया)

गिद्धों की  धरती यहाँ, गिद्धों  का आकाश।
फिर क्यों ये माँगें नहीं, हमसे  ताजी  लाश।
हमसे ताजी लाश, चाहिए हर दिन  इनको।
हमरी ही है उपज, दोष भी दूँ तो किन को।
मारकाट, आतंक, इन्हें  हसरत  युद्धों  की।
लाशों  के  हों  ढेर, कामना  है  गिद्धों  की।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.03.2019
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Thursday, March 28, 2019

741. झूठ हमेशा झूठ है (कुंडलिया)

741. झूठ  हमेशा  झूठ  है (कुंडलिया)

झूठ   हमेशा   झूठ  है, गले  न  इसकी  दाल।
चाहे   जितनी   देर   तू,  पगले   इसे  उबाल।
पगले इसे उबाल, आग  कितनी  भी भड़का।
कभी न आये स्वाद, लगा कितना भी तड़का।
कोंपल,  पात  विहीन, रहे  ज्यों  ठूँठ  हमेशा।
बदसूरत,  बदरंग,  दिखे   त्यों   झूठ   हमेशा।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
28.03.2019
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Monday, March 25, 2019

735. खरबूजों की आजकल (कुंडलिया)

735. खरबूजों की आजकल (कुंडलिया)

खरबूजों की आजकल, नहीं दिख रही खैर।
नहीं  बचेगी जान अब, मेल - मिलाप बगैर।
मेल - मिलाप  बगैर, छुरा  यह  ना  मानेगा।
जाल   बिछाकर   दुष्ट, फाड़ने  की  ठानेगा।
कुशल-क्षेम अब नहीं, यहाँ पर तरबूजों की।
आफत में  हैं जान, आजकल खरबूजों की।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
25.03.2019
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Sunday, March 24, 2019

732. पीले नीले चम्पई (कुंडलिया)

होली के पर्व पर थाली में सजे रंगों ने जब कामिनी के तन-वदन पर नजर डाली, तब उनकी जो हालत हुई, उस पर एक कुंडलिया छंद।

732. पीले नीले चम्पई (कुंडलिया)

पीले,  नीले,  चम्पई,  हरे,  गुलाबी,  लाल।
फूलों  ने   गोरी  लखी, हुए   सभी  बेहाल।
हुए  सभी  बेहाल, नूर  हर मुख का उतरा।
रंग-रूप-लावण्य, देख  तन सुथरा-सुथरा।
मुँह  लटकाए  पड़े,  गात  हैं   ढीले - ढीले।
सब के सब  गमगीन, हुए सब  पीले-पीले।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
24.03.2019
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731. झुमका नथनी चूड़ियाँ (कुंडलिया)

731. झुमका नथनी चूड़ियाँ (कुंडलिया)

झुमका,  नथनी,  चूड़ियाँ, कंगन  था  बेचैन।
पिय का  संदेशा  मिला, हिय को आया चैन।
हिय को आया चैन, जगी मन में अभिलाषा।
गोरी  दर्पण   देख, पढ़े   नयनों   की  भाषा।
यौवन  भरे   उछाल, देह   लेती   है  ठुमका।
सबके सब मदमस्त, चूड़ियाँ नथनी झुमका।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
23.03.2019
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Saturday, March 23, 2019

730. रहने दे प्रिय छेड़ मत (कुंडलिया)

730. रहने दे प्रिय छेड़ मत (कुंडलिया)

रहने  दे  प्रिय  छेड़  मत, दबे  हुए  जज़्बात।
कैसे सबके  सामने, कह  दूँ  दिल  की बात।
कह दूँ  दिल  की बात, प्रियतमा  ऐसे  कैसे।
जिसको रखा  छुपाय, सीप  में  मोती  जैसे।
हिय को  अपना दर्द, स्वयं हिय से  कहने दे।
दबे  हुए  जज़्बात, छेड़  मत  प्रिय  रहने दे।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
23.03.2019
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Monday, March 18, 2019

729. सोच समझकर बात कर (कुंडलिया)

729. सोच समझकर बात कर (कुंडलिया)

सोच समझकर  बात  कर, है चुनाव का वक्त।
पता नहीं किस बात पर, भड़क जाँय ये भक्त।
भड़क जाँय  ये  भक्त, कर  उठें   मारा  मारी।
किस  पल  ले-ले  प्राण, भीड़  इनकी हत्यारी।
धो   डालेंगे   मित्र,  तुझे   ये   रगड़-रगड़कर।
साथी कर  हर बात, यहाँ पर सोच समझकर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
18.03.2019
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Sunday, March 17, 2019

728. पौआ चार चढ़ाय के (कुंडलिया)

728. पौआ चार चढ़ाय के (कुंडलिया)

पौआ  चार  चढ़ाय  के, दोनों  भुजा  उछाल।
घीसू   गामा  सामने,  ठोंक   रहा   है   ताल।
ठोंक  रहा है  ताल, किसी  से नहीं सँभलता।
वश में है नहिं गात, गिरे फिर उठकर चलता।
नाली  में  है  पड़ा, उड़ रहे  सिर  पर कौआ।
लाखों  घीसू   गिरैं, कीच  में   पी-पी  पौआ।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
17.03.2019
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Friday, March 15, 2019

727. कुछ दोहे:

727. कुछ दोहे:

चुनकर भेजा था जिन्हें, वे बन बैठे भाट।
वोट कीमती दे उन्हें, हाथ लिए  हैं काट।।

बिकें विधायक शान से, लगी हुई है हाट।
नेता चूसे देश को, पब्लिक बारह बाट।।

भूखी  जनता, देश  की, कब से देखे बाट।
वो  ही  खाली  पेट है, वो  ही  टूटी  खाट।।

महलों ने हरदम करी, झोपड़ियों से घाट।
सब कुछ इनका छीन के, कर दिया बारह बाट।

दूध, दही, धन-सम्पदा, उन्हें महल, रजपाट।
हमको  फटी कमीज नहिं, ना ही  टूटी खाट।

सुरा-सुंदरी, दावतें, प्रभु  का  उन  पर  हाथ।
भूख-प्यास, बीमारियाँ, सब हरिया के साथ।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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सरकारें आईं गयीं, सकीं न  बेड़ी काट।
दूरी राजा रंक की, नहीं  सकीं  ये पाट।।

रणवीर सिंह (अनुपम)
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जीवन भर जूझत रहा, लेकर  खाली पेट।
मरते लाखों का हुआ, उसके शव का रेट।

जिंदों  की  है  कद्र  नहिं, मुर्दों  का  है रेट।
रहबर ही  इस देश के, आधा  लेंय  समेट।

जिनकी छप्पन भोग से, रोजहिं सजती प्लेट।
वे  उनके   हमदर्द   हैं, जिनके   खाली   पेट।

तब भी खाली पेट था, अब  भी  खाली पेट।

अपने-अपने  कार्य पर, सभी लगाओ ध्यान।
किसका क्या कर्तव्य है, सबको है यह भान।

तुम बिन सूनी सेज यह, चुभती है ज्यों खार।
सूना   है   घर  आँगना,  सूना   सब   संसार।

कंगन, झुमका, चूड़ियाँ, गुमसुम  हर श्रृंगार।
विरहन पिय की आस में,पथ को रही निहार।

निर्दोषों   को  कत्ल  कर, रहा  मनाता  जश्न।
अब  रिरियाता  फिर  रहा, देख दुर्दशा, हश्न।

छोटी    सी    हुंकार    से,    हुए   सैकड़ों    ढेर।
आज समझ में आ गया, क्या कर सकता शेर।

स्वच्छता पर तीन दोहे सभी गुणीजनों की प्रतिक्रिया हेतु।

देश  स्वच्छ,  सुंदर  बने,  ऐसा   हो   संकल्प।
स्वच्छ आचरण का सखे, होता नहीं विकल्प।

केरल या  कश्मीर हो, असम होय  या कच्छ।
नदियाँ  नाले  नालियाँ, गाँव नगर  हों स्वच्छ।

मन में  हो  कालिख  नहीं, समदर्शी हो  दृष्टि।
यही   ईश   से   कामना, सुंदरतम   हो  सृष्टि।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
26.02.2019
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06.03.2019, बुधवार को उत्तर प्रदेश  के संत कबीरनगर जिले के कलक्ट्रेट पर हुई एक मीटिंग में भाजपा  के एक सांसद, श्री शरद त्रिपाठी द्वारा उन्हीं की पार्टी के एक विधायक, श्री राजेश बघेल को सरेआम जूतों से की गयीं पिटाई की घटना पर, यह दोहा।

बड़े  काम  की  चीज  है, जूता  मेरे मित्र।
प्रतिद्वंदी के गाल का, तुरत बिगाड़े चित्र।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
06.03.2019
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भले हुए  कब राम के, शासक, सेवक, संत। स्वार्थ  साधने   में   लगे, नेता   और   महंत।

शीश ओखली में दिया, फिर काहे की फिक्र।
उखली में सिर दे दिया, फिर काहे की फिक्र।
क्या मोटा, पतला क्या, क्या चोटों का जिक्र।

बड़ी-बड़ी बातें सुनी, तुम्हरे मुख से मित्र।
जूतों ने बतला दिया, चहरा, चाल, चरित्र।

जूता   जूते    से   कहे, भ्रात   रहो   तैयार।
स्वामी जाने किस घड़ी, बना लेंय हथियार।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.03.2019
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नारी  जीवनदायनी, गतिमय  रखे  जहान।
पुरुषों से कमतर  नहीं, नारी  का अस्थान।

नारी में नवरस बसें, सकल गुणों की खान।
नारी  से  नर  ऊपजे, नारी  जाति   महान।

नारी अबला समझकर, कभी करो मत भूल।
नारी  दुर्गा,  कालिका, नारी   नर   का  मूल।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.03.2019
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आजादी    पाए    हमें,  गुजरे   सत्तर   साल।
भूख प्यास ना मिट सकी,मन में यही मलाल।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
11.03.2019
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जब से बालू पर लिखा, प्रिये तुम्हारा नाम।
लहरें आ-आ  देखतीं, भूल  गयीं हर काम।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
13.03.2019
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ऊँचनीच कुल-गोत्र का, धर्म-जाति का खेल।
अव्वल-दोयम  का यहाँ, फिर  कैसे  हो मेल।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
13.03.2019
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भाषा भाषण भाष्य का, क्यों इतना अपकर्ष।
परनिंदा   आठों   पहर,  नेता   करत   सहर्ष।

कथनी करनी सोच में, क्यों कोसों  का फर्क।
भाषा में अपकर्ष क्यों, क्यों यह तर्क-वितर्क।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
14.03.2019
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डेढ़ अक्ल थी  विश्व में, कहता  मेरा यार।
एक  खुदा  ने  दी  उसे, आधे  में  संसार।

अक्ल डेढ़ तोला बनी, कहता मेरा यार।
एक खुदा ने  दी  उसे, आधे  में  संसार।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
15.03.2019
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726. सागर ढिग जब से प्रिये (कुंडलिया)

726. सागर ढिग जब से प्रिये (कुंडलिया)

सागर  ढिग  जब से  प्रिये, खींचा  तुम्हरा चित्र।
तब से है व्याकुल जलधि, हालत दिखे विचित्र।
हालत  दिखे   विचित्र, उछालें  भरता  तब  से।
तब से  मन  उद्विग्न, चैन  नहिं  धरता  तब  से।
रूपसिंधु  में   डूब, भरे  निज   लोचन - गागर।
डूब - डूबकर    और,   डूबना    चाहे    सागर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
15.03 2019
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Thursday, March 14, 2019

725. जब से बालू पर लिखा (कुंडलिया)

725. जब से बालू पर लिखा (कुंडलिया)

जब से  बालू पर  लिखा, प्रिये तुम्हारा नाम।
लहरें आ-आ  देखतीं, भूल गयीं  सब काम।
भूल गयीं सब काम, सोचतीं  अपने  मन में।
कौन अवतरित  हुई, हाय आकर  जीवन में।
रोज उर्मियाँ जलभुन, रजकण  देखें तब से।
सजनी तुम्हरा नाम, लिखा बालू पर जब से।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
14.03.2019
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Wednesday, March 13, 2019

724. आजादी पाए हुए (कुंडलिया)

724. आजादी पाए हुए (कुंडलिया)

आजादी   पाए   हुए,  गुजरे  कइयों   साल।
तब भी वही सवाल थे, अब भी वही सवाल।
अब भी वही सवाल, किसलिए हैं हम जीते?
सिकुड़ा - सूखा   गात, चक्षु   हैं   रीते - रीते।
क्षुधा उपशमन  हेतु, पेट  से  पीठ मिला दी।
कैसे   हम  आजाद,  हाय   कैसी  आजादी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
13.03.2019
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Saturday, March 09, 2019

723. जूता जूते से कहे (कुंडलिया)

06.03.2019, बुधवार को उत्तर प्रदेश  के संत कबीरनगर जिले के कलक्ट्रेट पर हुई एक मीटिंग में भाजपा  के एक सांसद, श्री शरद त्रिपाठी द्वारा उन्हीं की पार्टी के एक विधायक, श्री राजेश बघेल को सरेआम जूतों से की गयीं पिटाई की घटना पर, यह कुंडलिया छंद।

723. जूता जूते से कहे (कुंडलिया)

जूता    जूते    से   कहे,  भ्रात   रहो   तैयार।
मालिक  जाने कब हमें, बना लेंय  हथियार।
बना लेंय  हथियार, हमें  किस  पर  दे  मारें।
किसके मुँह की शक्ल, चौखटा नाथ बिगारें।
स्वामी  लड़-भिड़  जात, हमारे  बलबूते  से।
भ्रात   रहो    तैयार,  कहे   जूता   जूते   से।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
09.03.2019
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Thursday, March 07, 2019

720. चतुर बहुरिया इस तरह (कुंडलिया)

720. चतुर बहुरिया इस तरह (कुंडलिया)

चतुर बहुरिया इस तरह, मत बर्तन खटकाय।
कामधाम को  छोड़कर, काहे  गाल  बजाय।
काहे  गाल   बजाय, सत्य   हर  कोई  जाने।
तू   ही   नहिं  विद्वान, यहाँ  हैं   कई  सयाने।
औरों पर इस तरह, उठा मत रोज  उँगरिया।
समझूँ  तेरी  चाल, अरे  ओ  चतुर  बहुरिया।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
07.03.2019
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Monday, March 04, 2019

718. सुरा-सुंदरी दावतें (कुंडलिया)

718. सुरा-सुंदरी दावतें (कुंडलिया)

सुरा - सुंदरी,  दावतें,  लक्ष्य   करें  आसान।
इनको सम्मुख देखकर, टल जाते व्यवधान।
टल जाते व्यवधान, काम खुद बा खुद होते।
विधि, विधान, कानून, मूँदकर आँखें  सोते।
सत्ता,  कुर्सी,  राजनीत   का   धुरा   सुंदरी।
जो  कोई  नहिं  करे, करे वह  सुरा - सुंदरी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
04.03.2019
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