जगह-जगह से खबरें आतीं, यूपी की बदहाली की।
रोज-रोज घृणित करतूतें, गुंडों और मबाली की।
जला दिया शब्बीरपुरा को, सत्ता के मद ने देखो,
मार काट की गली-गली में, रक्तवर्ण हर नाली की।
टीवी पर इक खबर न आई, जनता की बेहाली की।
ये सब मुख कैसे खोलेंगे, जब खुद की बिकवाली की।
लोकतंत्र का चौथा खंबा, मरा हुआ सा दिखता है।
राष्ट्रवाद की, जातिवाद ने, बोलो कब रखवाली की।
बड़े-बड़े समता के वादे, बातें बस खुशहाली की।
रत्ती भर हालत ना सुधरी, अब तक इस कंगाली की।
ये घड़ियाली आँसू कब तक, काम करेंगे मलहम का।
लुटती इज्जत धृष्टराष्ट्र बन, देख रहे पांचाली की।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
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