Tuesday, November 07, 2017

439. पाखंडी के दावों से (मुक्तक)

439. पाखंडी के दावों से (मुक्तक)

पाखंडी   के   दावों   से,  संसार   नहीं   बदला  करता।
अर्धसत्य,  झूठे,  तथ्यों  से,  सार  नहीं   बदल   करता।
खाल ओढ़कर बेशक गीदड़, खुद को कहता सिंह फिरे।
किन्तु आवरण के भीतर का, स्यार नहीं  बदला  करता।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
05.11.2017
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