Sunday, February 24, 2019

710. कभी न भाएं पास से (कुंडलिया)

710. कभी न भाएं पास से (कुंडलिया)

कभी  न  भाएं  पास  से,  पर्वत,  युद्ध, समुद्र।
लगें  मनोरम   दूर   से, मगर  निकट  से  रुद्र।
मगर  निकट  से  रुद्र, देख अन्तर  हिल जाते।
भय, दुख, दर्द, विपत्ति, सामने इक सँग आते।
शांति, अहिंसा, क्षमा, सत्य, मिल बोध कराएं।
पर्वत, युद्ध,  समुद्र, पास  से   कभी  न  भाएं।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
24.02.2019
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