707. जीते जी तो छोड़िये (कुंडलिया)
जीते जी तो छोड़िये, मरकर भी नहिं जात।
जन्मजात मिलती यहाँ, वो कहलाती जात।
वो कहलाती जात, जात आकर नहिं जाती।
दीमक के उनहार, राष्ट को रहती खाती।
मानवता दी फूँक, जात के लगा पलीते।
जात संग हम मरें, जात के सँग हम जीते।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
16.02.2019
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