Friday, March 30, 2018

542. भीमराव के नाम में (कुण्डलिया)

जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नजदीक आ रहा है, नई-नई खोजें होने लगीं हैं। इसी कड़ी में कल, 29.03.2018 को बाबा साहब डॉ. भीमराव के नाम में राम को खोजा गया। पर एक प्रश्न उठता है कि इन बुद्धिजीवी खोज कर्ताओं को इस खोज में इतने दशक क्यों लग गए।
आश्चर्य नहीं होगा जो कल नए नारे का अन्वेषण "जय श्रीराम" की जगह "जय भीम जय भारत जय श्रीराम" हो जाय। पर लाख टके का सवाल यह है कि क्या राम और भीमराव के आचरण से हम कुछ सीख सके।
 
542. भीमराव के नाम में (कुण्डलिया)
 
भीमराव  के   नाम   में,  ढूँढ़  लिए  हैं  राम।
भीम-राम पर आजकल, छिड़ा हुआ संग्राम।
छिड़ा  हुआ   संग्राम,  लगें  इनके  जयकारे।
राजनीत   को  आज,  दिखें   ये   तारनहारे।
गर्व-दर्प, सम्मान, बिके  सब बिना  भाव के।
चरणों  में  हैं  पड़े, आज  सब  भीमराव के।
 
रणवीर सिंह 'अनुपम'
29.03.2018
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Thursday, March 29, 2018

541. काग दही पर जान गँवाया (मुक्तक)

एक बार एक कौआ हलबाई की दुकान पर दही खाने के लिए आया तो हलबाई ने उसे उड़ाने के लिए डंडा घुमाया जो कौए के लग गया और वह मर गया। जिससे द्रवित होकर उस कम पढ़े-लिखे हलबाई ने टूटे-फूटे शब्दों में दीवार पर खड़िया से लिखा "कागदही पर जान गँवाया"। एक दिन वहाँ पर आये तीन व्यक्ति आये जिसमें एक भूखा, दूसरा विद्वान और तीसरा भोगी प्रवृत्ति का था। तीनों ने अपने-अपने हिसाब से इस वाक्य का क्या-क्या अर्थ निकाले, यह देखिए।

541. काग दही पर जान गँवाया (मुक्तक)

भूखा बोला भूख की खातिर, काग  दही पर जान गँवाया।
साधु-साधु  कह ज्ञानी बोला, कागद  ही  पर जान गँवाया।
भोगी  बोला  जन्म  लिया  तो,  खाता-पीता मौज उड़ाता,
मरना  ही था  हूर  पे  मरता, का  गदही  पर जान गँवाया।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
28.03.2018
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Saturday, March 17, 2018

538. प्रेम सरहद पहाड़ों से (मुक्तक)

538.  प्रेम सरहद पहाड़ों से (मुक्तक)

प्रेम सरहद पहाड़ों से कब है रुका, प्रेम  को कैद में रख सका कौन है।
प्रेम अहसास है प्रेम विश्वास है, प्रेम मुखरित नहीं   प्रेम   तो   मौन  है।
प्रेम  वाणी  नहीं  प्रेम  भाषा  नहीं,  प्रेम का    प्रेम-ग्रंथों से  क्या  वास्ता,
प्रेम  परिपूर्ण है, प्रेम  संपूर्ण  है,  प्रेम  बिन     स्वयं भगवान भी पौन है।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
17.03.2018
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Friday, March 09, 2018

537. चलो महिला दिवस पर भी

537. चलो महिला दिवस पर भी

चलो महिला दिवस पर भी, बजा लें गाल हम खाली।
हमें भी है  यहाँ  फुरसत, दिखो  तुम  भी हमें खाली।

गया त्रेता गया द्वापर, मगर हालात  हैं वो ही,
घुटन, तड़पन वही जिल्लत, मिला बाजार है खाली।

तजुर्बेदार हम भी हैं, जहाँ हमने  भी देखा है,
करो कुछ काम की बातें, बजाओ  गाल मत खाली।

जो  औरत  है  तो जीवन है, ये दुनिया  है ये सृष्टी है,
मरी जो ये  मरेंगे सब, मरेगी ये  नहीं खाली।

रणवीर सिंह (अनुपम)
08.03.20018
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Thursday, March 08, 2018

536. कुत्सित सोच कुनीति का (कुण्डलिया)

जिस तरह से 2 दिन पूर्व त्रिपुरा में भाजपा की जीत के बाद दिन दहाड़े गुंडों द्वारा बडोजर से लेनिन की मूर्ति को धराशायी करना, उसके बाद वहाँ के राज्यपाल का वक्तव्य, फिर तमिलनाडु में पेरियार और मेरठ में अम्बेडकर की मूर्तियाँ तोड़ा जाना, यह सब दिखाता है कुछ लोग यह दिखाना चाहते है कि वे कुछ भी कर सकते है उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं, वे समाज में वैमनस्य फैलाते रहेंगे। ऐसा लगता है कि यह सब प्रायोजित किया जा रहा है। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका और पश्चिम बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को भी क्षति पहुँचाई गयी। यह कुत्सित सोच देश के लिए घातक है इसे रोकने की जरूरत है। इस कृत्य और प्रवृत्ति की जितनी निंदा की जाय उतनी कम है।

536. कुत्सित सोच कुनीति के (कुण्डलिया)

कुत्सित सोच कुनीति के लेनिन हुए शिकार।
पेरियार   अम्बेडकर,  पर   भी  हुआ  प्रहार।
पर  भी  हुआ  प्रहार,  किसी ने  ना  चेताया। 
घायल  श्यामा हुए, होश  तब  जाकर आया।
कुछ भी ना आश्चर्य, सभी कुछ है प्रायोजित।
ले  डूबे ना देश, सोच  यह  घटिया  कुत्सित।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.03.2018
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Tuesday, March 06, 2018

535. संरक्षण तुमको मिला (कुण्डलिया)

535. संरक्षण तुमको  मिला (कुण्डलिया)

संरक्षण  तुमको  मिला, जी  भर करिये  लूट।
लूटन-पीटन  की  तुम्हें,  मिली   हुई   है  छूट।
मिली   हुई   है   छूट,   बैंक   बेखटके   लूटो।
बाँध-बूँध   संपत्ति,  देश  से   इक  दिन फूटो।
नेताओं   के  संग,  राष्ट्र  का   करिये  भक्षण।
तुमको किसकी फिक्र, प्राप्त जब है संरक्षण।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
05.03.2018
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फूटो-भाग आओ

Sunday, March 04, 2018

534. लठै लठा है दिख रहा (कुण्डलिया)

534. लठै लठा है दिख रहा (कुण्डलिया)

लठै लठा है दिख रहा, दिखे न  सूत कपास।
कोरी  नाचत  फिर  रहा,  झूठी  पाले  आस।
झूठी  पाले  आस,  बावला  भ्रम  में  उलझा।
बातों से कब भला, भूख का मसला सुलझा।
जानत है  बिन दूध, कभी  नहिं  होत मठा है।
फिर भी बिना कपास, कोरि घर लठै लठा है।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
04.03.2018
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लठ्ठम  लठ्ठा दिख  रहा, दिखे न सूत कपास।
कोरी  नाचत  फिर  रहा,  झूठी  पाले  आस।
झूठी  पाले  आस, बावला  भ्रम  में  उलझा।
बातों से कब भला, भूख का मसला सुलझा।
जानत है  बिन दूध, कभी  नहिं  होता  मठ्ठा।
फिर भी बिना कपास, कोरि घर लठ्ठम लठ्ठा।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
04.03.2018

Friday, March 02, 2018

532. होली में हुड़दंग

532.  होली में हुड़दंग

सेमल, जामुन, आम, अनार,  सभी  बौराये  बाग बगीचे।
भंग के  संग मची  हुड़दंग, गए खुल  सिगरे द्वार-दरीचे।
भाज रही  घर भीतर  कोई,  कोइ पकड़ कैं बाहर खींचे।
जबरन जात घुसे घर में सब, भीज रहे  गद्दा  औ गलीचे।

कोइ  उलीच  रही   लोटन  से,  कोई  दोनों  हाथ उलीचे।
कोइ  छुपाय  रही  जोबन कौं, कोइ  पकड़ गालन को भींचे।
कोई खुद  में सिमट रही तो, कोई लाज से आँखें  मींचे।
कोइ दबाए  है जाँघन बिच, कोइ दिखे खुद जाँघन नीचे।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
02.03.2018
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