703. भूख भय अरु बेबसी पर (मुक्तक)
भूख भय अरु बेबसी पर, अब कोई लिखता नहीं।
बात कहता किन्तु कहकर, बात पर टिकता नहीं।
शान से हर ओर बिकता, झूठ देखो थोक में,
सत्य का है हाल फुटकर, में भी यह बिकता नहीं।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
27.01.2019
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703. भूख भय अरु बेबसी पर (मुक्तक)
भूख भय अरु बेबसी पर, अब कोई लिखता नहीं।
बात कहता किन्तु कहकर, बात पर टिकता नहीं।
शान से हर ओर बिकता, झूठ देखो थोक में,
सत्य का है हाल फुटकर, में भी यह बिकता नहीं।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
27.01.2019
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702. जरूँ शाम से रात तक (कुंडलिया)
जरूँ शाम से रात तक, रातहिं आधी रात।
बार-बार मैं बारती, बार-बार बुझ जात।
बार-बार बुझ जात, ठिठोली तुमको सूझे।
बेकल हिय से हाय, कौन क्षण नाहीं जूझे।
बार-बार थक गई, उबर ना सकी काम से।
कंडे माफिक रोज भोर तक, जरूँ शाम से।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
24.01.2019
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701. संझा से भई रात है (कुंडलिया)
एक दबंग व्यक्ति अपने निर्धन दामाद जिसका नाम रंझा था के साथ अपनी बेटी जिसका नाम मंझा था का गौना करने से मना कर देता है। रंझा पंचायत कराता है जो उसके हक में फैसला देती है पर उसका ससुर फैसला नहीं मानता। रंझा उसी गांव में किनारे पर एक झोपड़ी डालकर रहने लगता और गांव वालों के पशुओं को चराने का काम करने लगता। यह सब उसके ससुर को नागवार गुजरता है और वह उसे धमकाता है कि वह गांव छोड़कर चला जाय। पर रंजा उसकी बात नहीं मानता। जिससे क्रोधित हो उसका ससुर एक दिन जंगल में उसकी हत्या कर देता है। जब रंझा शाम को गाँव में नहीं लौटता तो उसकी पत्नी मंझा अपने पिता से छुपकर जंगल में उसे ढूँढ़ने जाती है तो उसे वहाँ उसकी लाश मिलती है। वह रुदन करती है और उसका दाह संस्कार करने की कोशिश करती है पर उसकी चिता बार-बार बुझ जाती है। इस तरह धीरे-धीरे शाम से सुबह होने को आ जाती है पर चिता आग नहीं पकड़ती। तब मंझा अपने मृतपति रंझा से जो कहती है उस पर एक कुंडलिया छंद।
701. संझा से भई रात है (कुंडलिया)
संझा से भई रात है, रातहिं हुआ प्रभात।
बार-बार मैं बारती, बार-बार बुझ जात।
बार-बार बुझ जात, ठिठोली तुमको सूझे।
मम हियरा की बात, नाथ कबहूँ नहिं बूझे।
बरते काहे नाँय, कहे मंझा, रंझा से।
बार-बार थक गई, बलम बारूँ संझा से।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
23.01.2019
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संझा से - शाम से; भई - हुई; बार-बार - बारम्बार; बारती - जलाती; जात - जाते हो; सूझे - सूझ रही है; बूझे - पूछे; बरते - जलते; काहे - क्यों; नाँय - नहीं; बार-बार - जलाते-जलाते; बारूँ-जलाऊँ।
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699. चंचल नजरें चंचला (कुंडलिया)
चंचल नजरें चंचला, चितवत चारहुँओर।
चुनरी को लहरा रही, उँगलिन दाबे छोर।
उँगलिन दाबे छोर, देह जा सुथरी-सुथरी।
ज्यों कोई अप्सरा, स्वर्ग से धरती उतरी।
उन्नत उभरे शृंग, और यह बेसुध अंचल।
चितवत चारहुँओर चंचला, नजरें चंचल।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
21.01.2019
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698. पिया न आये लौटकर (कुंडलिया)
पिया न आए लौटकर, पल-पल देखूँ राह।
कंडे-सी सुलगूँ जरूँ, हिय से उठे कराह।
हिय से उठे कराह, जिया मिलने को तरसे।
नैनन बरसे नीर, लगे ज्यों सावन बरसे।
भोर, दोपहर, साँझ, रात, नित आए-जाए।
पिय बिन पीली भई, लौटकर पिया न आए।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
21.01.2019
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697. सजनी रजनी में खिला (कुंडलिया)
सजनी रजनी में खिला, शशि सा तेरा रूप।
आनन की आभा लगे, सूर्यमुखी पर धूप।
सूर्यमुखी पर धूप, चित्त को कौन सँभाले।
भ्रमर चक्षु ने हार, हिया कर दिया हवाले।
यौवन अरु लावण्य, और पूनम की रजनी।
तन में आग लगाय, रूप यह तेरा सजनी।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
20.01.2019
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696. घूँघट पीछे चंद्रमुख (कुंडलिया)
घूँघट पीछे चंद्रमुख, अधरन बिच मुस्कान।
श्याम चक्षु नीची नजर, एक दिन लेंगे जान।
इक दिन लेंगे जान, नैन दोऊ कजरारे।
उस पर ये रँग-रूप, देख दिल को नहिं हारे।
इधर नैन बेचैन, ताकते हैं अमृत घट।
उधर रूप-मकरंद, अकेले चाखे घूँघट।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
20.01.2019
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