Sunday, June 11, 2017

360. हिंद के किसान की न (कवित्त)

360. हिंद के किसान की न (कवित्त)

23 दिसंबर - किसान दिवस

हिंद के किसान की न, देखी जाती दशा आज,
सदियाँ    गुजर   गयीं,    वही   बुरा   हाल  है।

चिथड़ों  से  तन ढके, भूखा - प्यासा  लगा रहे,
जनने   से    मौत   तक,   जिये   फटेहाल   है।

दवा-दारू, शिक्षा, दूध, सपनों  की  बात  लगे,
दोनों   वक्त   नून   रोटी,   मिलना   मुहाल  है।

सबका  जो   पेट  भरे,  वही  विष  खाके  मरे,
फाँसी पे  लटक रहा,  किसी  को  न ख्याल है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
10.06.2017
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जनने-जन्म; नून-नमक; मुहाल-दुष्कर

359. कागज़ पर ही हो रही (कुण्डलिया)

359. कागज़ पर ही हो रही (कुण्डलिया)

कागज़  पर  ही   हो  रही,  खुशहाली  की  बात।
विज्ञापन    समझा   रहे,   अच्छे     हैं    हालात।
अच्छे  हैं  हालात,  कृषक फिर  सड़कों पर क्यों।
जब सब कुछ है ठीक, तुझे फिर लगता डर क्यों।
नौ  गज  की  उपलब्धि, बताता फिरता सौ गज।
ओ  रे  तिकड़मबाज,  दिखा  मत  झूठे  कागज।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
10.06.2017
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Saturday, June 10, 2017

358. हालात हैं अच्छे नहीं

358. हालात हैं अच्छे नहीं

आजकल  आबोहवा  हालात  हैं  अच्छे  नहीं।
रहनुमाओं  के  यहाँ  ब्यानात  हैं  अच्छे  नहीं।

ये मगरमच्छों  के आँसू  यार अपने  पास रख,
ये  रुँआसा  मुख तेरा  जज्बात  हैं अच्छे नहीं।

दूसरों  पर  दोष  मढ़कर, मत  बनो  निर्दोष यूँ,
कथनी, करनी आपके ख्यालात हैं अच्छे नहीं।

तख्त पर  बैठा उसे भगवान  कहना सीख लो,
अन्यथा  फिर आपके,  दिनरात हैं अच्छे नहीं।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
10.06.2017
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357. हत्याओं का दौर है (कुण्डलिया)

357. कुण्डलिया छंद

हत्याओं  का  दौर   है,  राष्ट्रवाद  का  शोर।
धर्मजाति के  नाम पर,  मारकाट  चहुँओर।
मारकाट  चहुँओर, करन  की  है  आजादी।
मजलूमों  की जान,  ले  रही खाकी-खादी।
को  है  जिम्मेदार, गाँव  की  इन आहों का।
किस दिन होगा बंद, दौर यह हत्याओं का।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
09.06.2017
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Tuesday, June 06, 2017

356.बड़ी अनोखी बात है (कुण्डलिया)

356. कुण्डलिया छंद

बड़ी अनोखी  बात है, बड़ा  अनोखा साथ।
सेवक महलों  में रहे, स्वामी  को  फुटपाथ।
स्वामी को फुटपाथ,  भूख  से  मरे बिचारा।
फटेहाल  चुपचाप, रोज  कर  रहा  गुजारा।
ये  तेरा   रँग-रूप,   हाय   ये   तेरी  शोखी।
सेवक  तेरी  बात,  दिखे  है  बड़ी अनोखी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
05.06.2017
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Saturday, June 03, 2017

355. जगह-जगह से खबरें आतीं

जगह-जगह से खबरें आतीं, यूपी की बदहाली की।
रोज-रोज घृणित करतूतें, गुंडों और मबाली की।
जला दिया शब्बीरपुरा को, सत्ता के मद ने देखो,
मार काट की गली-गली में, रक्तवर्ण हर नाली की।

टीवी पर इक खबर न आई, जनता की बेहाली की।
ये सब मुख कैसे खोलेंगे, जब खुद की बिकवाली की।
लोकतंत्र का चौथा खंबा, मरा हुआ सा दिखता है।
राष्ट्रवाद की, जातिवाद ने, बोलो कब रखवाली की।

बड़े-बड़े समता के वादे, बातें बस खुशहाली की।
रत्ती भर हालत ना सुधरी, अब तक इस कंगाली की।
ये घड़ियाली आँसू कब तक, काम करेंगे मलहम का।
लुटती इज्जत धृष्टराष्ट्र बन, देख रहे पांचाली की।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
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353. घोड़ा-घोड़ा होत है (कुण्डलिया)

कुण्डलिया छंद

घोड़ा - घोड़ा  होत  है, गधा - गधा ही होत।
घोड़ागाड़ी  में सखे, कभी गधा  मत  जोत।
कभी गधा मत जोत, काम ये नहीं गधे का।
नशा जोश का सही, रोग पर  बुरा नशे का।
गधा मनुज से ज्ञान, पा गया जब से थोड़ा।
रेंक-रेंक  कर  कहे, गधा  नहिं मैं  हूँ घोड़ा।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
02.06.2017
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