Wednesday, May 23, 2018

552. दारू पीकर मर रहे (कुण्डलिया)

552. दारू पीकर मर रहे (कुण्डलिया)

दारू  पीकर  मर रहे, निर्धन अनपढ़ लोग।
प्रतिदिन बढ़ता जा रहा, यह चौतरफा रोग।
यह चौतरफा  रोग, दिखाई  हल  नहिं देता।
नागफाँस-सा जकड़, प्राण पल में ले लेता।
पी-पीकर  नौजवां,  हो  गए  सूखे  कीकर।
मरें  सैकड़ों  रोज, विष भरी  दारू  पीकर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
22.05.2018
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