547. क्या नहीं अब तक किया है
क्या नहीं अब तक किया है, इस शहर के वास्ते।
दांव पर खुद को लगाया, इस नगर के वास्ते।
आप जिस पर चल रहे है, इस तरह बेखौफ हो,
बहुत कुछ करना पड़ा है, इस डगर के वास्ते।
जान पाओगे नहीं तुम, किस कदर मैं चाहता,
खुद नजर नीची रखी है, इस नजर के वास्ते।
आजकल इंसान दोयम, जानवर अब्बल हुआ,
कौन हक की बात करता, अब बशर के वास्ते।
मत मुझे सिखलाइये तुम, रहबरी है चीज क्या,
जान तक देते लुटा हम, इक शजर के वास्ते।
जोड़कर परिवार रखना, है नहीं आसान अब,
टूटकर जुड़ना है' पड़ता, रोज घर के वास्ते।
आज मुझको रोकिए मत, बस यही है इल्तिजा,
आज मैं निकला सफर पर, इक सफर के वास्ते।
रणवीर सिंह 'अनुपम'
12.05.2018
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