Sunday, June 25, 2017

368. योगा कर

368. योगा कर

सब मर्जों  की  एक दवा है, योगा कर।
इस दुनिया में कौन सगा है, योगा कर।
प्रश्न छोड़ सब सिर्फ अरे तू, योगा कर।
जो जलता  वो  जले मरे तू, योगा कर।

काम चाहिये, अरे  छोड़ तू,  योगा कर।
दाम  चाहिये, अरे  छोड़  तू, योगा कर।
कर्ज चढ़ा है, अरे  छोड़  तू, योगा कर।
दर्द  बढ़ा  है, अरे  छोड़  तू, योगा कर।

बच्चों  की  फीसें भरनी  हैं, योगा  कर।
बेटी  की  शादी  करनी  है,  योगा  कर।
खुशहाली की बात न कर तू, योगा कर।
कोई  पश्चाताप  न   कर   तू, योगा कर।

घर  में   तेरे   चून  नहीं  तू,  योगा  कर।
चावल  मिर्ची  नून  नहीं  तू,   योगा कर।
बिटिया  भूखी  चिल्लाये  तू,  योगा कर।
बेशक  मरती  मर  जाये  तू,  योगा कर।

राष्टवाद  के  नारे   के  सँग,  योगा  कर।
भारत  के जयकारे  के सँग, योगा  कर।
जै जवान चिल्ला-चिल्लाकर, योगा कर।
देशभक्ति  के  गीत  सुनाकर, योगा कर।

तू  किसान  है  रोटी  मत खा, योगा कर।
गोली  खा  पेड़ों   पे  लटका, योगा  कर।
मैं   मंत्री   हूँ   बतलाता   हूँ,   योगा कर।
तुझको निशदिन समझाता हूँ, योगा कर।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
24.06.2017
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Saturday, June 24, 2017

366. जग से मत भाग अरी सखि तू (दुर्मिला सवैया)

366. दुर्मिला सवैया (आठ x सगण)

जग से मत भाग अरी सखि तू, कछु नाँहि धरो इहि  जोगन में।
इहि कारण का अबलौं पगली, बदनाम भयी सब लोगन में।
आपने मन को समझाउ सखी, कछु ना कछु राज वियोगन में।
उनका मन भी कब तृप्त भयो, जिन उम्र गयी रस भोगन में।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
24.06.2017
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जोगन-वैराग्य; इहि-इस; अबलौं-अब तक; लोगन-लोगों; वियोगन-विछोह, विरह; भोगन-भोगने।
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365. अब बात नहीं कछु काम (दुर्मिला सवैया)

365. दुर्मिला सवैया आठ सगण (112)

अब बात नहीं कछु काम करो, कछु नाहिं धरो इन बातन में।
मत बाँट हमें शुभचिंतक तू, निज धर्मन में निज जातन में।
कुरसी हित में मत घात करे, हित नाहिं दिखे इन घातन में।
अब वाद-विवाद को छोड़ सखे, कछु लाभ न घूँसन-लातन में।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
25.06.2017
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बातन-बातों;   जातन-जातियों; नाहिं-नहीं; घातन-घातों; लातन-लातों

364. बड़ी ही सावधानी से (मुक्तक)

364. बड़ी ही सावधानी से (मुक्तक)

बड़ी  ही  सावधानी से, नजर को चार करती है।
निशाना  साध छाती  पर, करारा वार  करती है।
बड़ी हुशियार है जालिम, सँभलने भी नहीं देती।
नज़र के तीर को सीधा, जिगर के पार करती है।

रणवीर सिंह (अनुपम)
23.06.2016
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Wednesday, June 21, 2017

363. जब से पति की चिठिया (सवैया छंद)

363. दुर्मिला सवैया छन्द
सगण (112) x 8

जब से पति की चिठिया है मिली, तब से फिरती चहकी - चहकी।
इतरा - इतराकर   बात  करे,  घर  बीच  फिरे   लहकी - लहकी।
तन  से  मदमस्त  सुगंध  बहे,  सब  सृष्टि   लगे  महकी - महकी।
कहुँ  पैर  धरे   कहुँ  पैर  परे,  कमनीय   दिखे   बहकी - बहकी।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
20.06.2017
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Monday, June 19, 2017

362. वह माँ का दिन यह पापा का (मुक्तक)

वह माँ का दिन, यह पापा का, नौटंकी ये  बंद करो।
जो सुकून दे मात-पिता को, अरे काम  वो चंद करो।
दिवसों  में  माँ-बाप  ढूँढ़ते, फिरते  हो  अह नादानों।
पश्चिम की इस भेड़चाल में, काहे मति को मंद करो।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
19.06.2017
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Sunday, June 18, 2017

361. नहिं छंद न छंदक ज्ञान सखे (दुर्मिला सवैया)

361. नहिं छंद न छंदक ज्ञान सखे (दुर्मिला सवैया)
आठ सगण (112)

नहिं छंद न छंदक ज्ञान सखे, किस भाँति लिखी तुम यो कविता।
नहिं शब्द दिखें नहिं भाव दिखें,  इसको  तुम यार कहो  कविता।
रसहीन  मलीन अगीत  लगे,  बिन ज्ञान लिखो  तुम जो कविता।
कविता तब  ही कविता लगती,  जब  ताल  तरंगित  हो कविता।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
15.06.2017
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