Sunday, December 30, 2018

664. प्रेम की फसल को (घनाक्षरी)

664. प्रेम की फसल को (घनाक्षरी)

प्रेम की फसल  को  उगाने  हित साथी मेरे,
दिल की जमीन को मैं, गोड़-गाड़ आया हूँ।

सबसे  है बैर  लिया, तेरे  लिए  मेरी प्रिया,
जाति-धर्म  बंधनों को, तोड़-ताड़ आया हूँ।

तुझको क्या लगता है, ऐसे जग  मान गया,
कितनों के हाथ-मुँह, फोड़-फाड़  आया हूँ।

अब तो लगा ले गले, मुझको ओ मेरी जान!
तेरे   लिए   घर-द्वार, छोड़-छाड़  आया  हूँ।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
30.12.2018
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Saturday, December 15, 2018

658. गरीबी भूख बेकारी (मुक्तक)

658. गरीबी भूख बेकारी (मुक्तक)

गरीबी  भूख  बेकारी  के  मसलों  पर  लिखे  अब को।
सभी व्यापार में गाफ़िल तो फसलों पर लिखे अब को।
उदर  खाली  फटी  बनियान  ठिठुरें आसमां  नीचे।
बुझे  चूल्हे  पतीली  मौन  तसलों  पर  लिखे  अब को।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
15.12.2018
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Sunday, December 09, 2018

657. भूख भय शिक्षा गरीबी (मुक्तक)

657. भूख भय शिक्षा गरीबी (मुक्तक)

भूख भय  शिक्षा  गरीबी, धर्म  के  सँग  बह  गये।
खत्म हर  मसला हुआ बस, गाय-मंदिर  रह गये।
आजकल  हनुमान जी  भी, हो गए शोषित दलित।
हम सभी से  सत्य यह, आदित्य  योगी  कह गये।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
09.12.2018
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Saturday, December 08, 2018

656. अर्जुन प्रण हो या दसरथ (मुक्तक)

656. अर्जुन प्रण हो या दसरथ (मुक्तक)

656. अर्जुन प्रण हो या दसरथ (मुक्तक)

छः दिसंबर के बाद, आज एक बात समझ में आई कि बड़े पदों पर आसीन व्यक्तियों को बड़ी बात बहुत सोच-विचारकर करनी चाहिए। खासकर तब, जब कोई प्रण लेने जा रहे हों। क्योंकि "प्राण जाँय पर वचन न जाही" को निभाना सबके बूते की बात नहीं।

अर्जुन प्रण हो या दसरथ प्रण, प्रण साधारण बात नहीं।
सोच समझकर बात किया कर, बात सिर्फ है बात नहीं।
उतनी ही  थूका-थाकी  कर, जितने  को  तू  चाट सके।
प्राण जाँय पर वचन न जाए, सब में  यह औकात नहीं।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.12.2018
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655. काहे के धर्माधिकारी आप हैं (मुक्तक)

655. काहे के धर्माधिकारी आप हैं (मुक्तक)

काहे  के  धर्माधिकारी  आप   हैं,  एक  भी  आदर्श  जो  नहिं गढ़ सके।
वेद पाठन यह भला  किस  काम का, वेदना इंसान की  नहिं पढ़ सके।
आस्तीनों  को  चढ़ा  छाती  फुला, खुद  को अल्ला  राम जो कहते फिरें।
आदमी वे आदमी की राह पर, दो कदम भी आज तक नहिं बढ़ सके।

रणवीर सिंह 'अनुपम'
08.12.2018
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